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चाहत

नवरात्रि का समय था,और घर पर कन्या भोज था। उसी दौरान मैं अपने ससुराल गई थी। भाभी जी ने कहा कि मैं कन्या बुलाकर लाती हूं। अब हम जिस शहर और कॉलोनी में रहते हैं वहां कन्याएं ढूंढना बड़ा मुश्किल काम है, क्योंकि बच्चे क्या उनके माता-पिता भी नहीं पसंद करते उन्हें खाने के लिए किसी और के घर भेजना। तो ऐसे में मुझे लगा अब तो भाभी जी छूटी एक डेढ़ घंटे के लिए, क्योंकि कन्याएं ऐसे ही थोड़े आ जाती हैं आजकल। यह सोच मैं दूसरे कामों में लग गई कि जब तलक वो सभी को इकठ्ठा करेंगी तब तक मैं अपने काम भी निपटा लूंगी। लेकिन अभी सोच ही रही थी भाभीजी सात कन्याओं की टोली लेकर पधारी। मैं हैरान थी कि पांच मिनट में इतनी बालिकाएं कहां से मिल गई इन्हें! खैर हमारा काम तो हो चुका था, बची थी दो कन्याएं जो हमारी भतीजियां मिलाकर पूरी हो गई। अच्छे से भोज संपन्न हुआ।

सबके जाने के बाद मैंने अपनी जेठानी से पूछा कि आपने इतनी जल्दी इतनी सारी बच्चियां कैसे जुगाड़ ली। तो उन्होंने बताया कि हाल ही में पड़ोस की झुग्गी-बस्ती में एक औरत आई है जिसकी सात बेटियां हैं। ये सुनकर तो मैं हैरान रह गई। फिर उन्होंने बताया कि उनके अनुसार भ्रूण हत्या पाप है अतः बच्चा गिराने की बजाय जन्म देना ही सही है।ऐसे में मैंने कहा कि "सावधानी बरतनी चाहिए"! तब उन्होंने बताया कि दरअसल उन्हें बेटे की चाह है जिसकी लालसा में वे लगभग हर एक डेढ़ साल में एक बच्चा पैदा करती है। ये सुनकर तो मेरे पास कहने को शब्द ही नहीं बचे कि एक बेटे की चाहत में जाने कितनी बेटियों को बदतर जीवन देने को आतुर हैं ये लोग। सरकार चाहे कितनी ही मुहिम चलाए, मनुष्य की विचारधारा परिवर्तन इतना आसान काम नहीं!

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