सबसे बड़ा हिस्सा
'बाबू श्यामलदास' बड़ी वसीसत छोड़ गए थे। पर वसीयत में क्या किसके नाम था, वो कोई नहीं जानता था। वकील से बात हो गई थी कि जो उनके जाने के बाद सारा भार संभालेगा अधिकांश हिस्सा उसी के नाम होगा। इतना पता चलते ही तीनों भाइयों में 'बाबूजी' की मृत्य पश्चात सारे रीति-रिवाज निभाने की होड़ सी लग गई। हर कोई सबसे बेहतर करना चाहता था। बड़ा भाई यह कहकर सबसे आगे निकलने की करता कि 'मैं सबसे बड़ा हूं, इसलिए बड़ा जिम्मा मेरा'। कभी छोटा यह कहता कि 'छोटों के होते आप इतना बीड़ा उठाएं, शोभा नहीं देता।' मंझला कुछ ना कहता पर अपनी तरफ से अच्छा करने की कोशिश करता। ऐसे ही होड़ में तेरह दिन निकल गए।
चौदहवें दिन वकील का इंतज़ार बेसब्री से हो रहा था। वकील महाशय की अच्छी खातिरदारी की गई। वकील साहब ने वसीयत नामा सुनाना शुरू किया। अपने हक का सुनने के बाद भी सभी को उस बड़े हिस्से की प्रतीक्षा थी। और अंत में जब उस महत्वपूर्ण भाग को सौंपने की बारी आई, तब लेने वाले को बड़ा झटका लगा। और जिनके हाथ ना लगा उन्होंने चैन की सांस ली। उनके हावभाव और मंशा भांपने के बाद, 'मां' समझ नहीं पा रही थी कि खुश हो या दुखी। 'सच में हिस्सेदारी तो सभी को चाहिए थी पर जिम्मेदारी किसी को नहीं।'
