मां का संघर्ष
. (कहानी)
. *मां का संघर्ष*
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हर कोई अपनी- अपनी तरह से संघर्ष करता है। जीवन में उसने भी संघर्ष किया। वह भी तब जब वह शादी के बाद मां बनना चाहती थी। संघर्ष इतना ज्यादा था ,जिसकी कोई हद नहीं थी ।वह हरदम सोचती किस तरह मैं अपनी समस्याओं से लड़ते रहू।
यह कहानी उस समय की है ,जब उसकी शादी एक शहर में हुई वह 28 साल की थी। उसने अपने जीवन में पढ़ी-लिखी होने के कारण और अपनी आगे की जिंदगी को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द मां बनने की लिए सोचा ।लेकिन जब 6 महीने पूरा हो गया और गर्भ नहीं रुका तो वह चिंतित हो गई और उसके मायके वाले भी सोचने लगे और उसने इलाज करना चालू किया । लेकिन ससुराल वाले चाहते ही नहीं थे। यहां उल्टा महसूस होने लगा, वैसे ससुराल वाले औलाद के लिए जल्दी करते है, लेकिन उसके सासु मां इस बात से कि वह इलाज कराये तैयार नहीं हो रही थी। वह बार-बार उनसे कहती थी सामने वाले को देखो उसने छोटे वाले भाई की औलाद को गोद लिया है ।कुछ समझ में नहीं आ रहा था, कि उसकी सास ऐसा क्यों कह रही है। उसकी शादी के 6 महीने बाद ही रायपुर में उसके पति ने बिजनेस खोला था फिर इस वजह से वह रायपुर गई थी (कुछ समय के लिए) 6 महीने के लिए क्योंकि उसके पति ने वहां बिजनेस खोला हुआ था। उसने वहां भी कोशिश जारी रखी।उसने अपने अनुसार जानकारी उठाई और अपना कार्य चालू रखा ।उधर दूसरी ओर उसके मायके वाले भी इसके लिए तैयार थे। कि कोई इलाज करा कर जल्द से जल्द गर्भ धारण हो उन्होंने डॉक्टर (मायके वालों ने ) को दिखाया ।लेकिन कहानी कुछ और थी आज भी इस बात को नकारा नहीं जाता है, कि कभी-कभी किसी को किसी का सुख पसंद नहीं आता इस तरह किसी ने गर्भ बांध दिया था ।बाहरी इलाज से गर्भ तो खुल गया । डेढ़ साल बाद ही गर्भ ठहर गया और इस बिच वह दिवाली में वापस अपने सास के पास आई हुई थी, लेकिन जैसे ही गर्भ ठहरा और एक महीना पूरे ही हुए थे तो उसको महसूस होने लगा लेकिन कुछ समस्या आ रही थी और उसने अपनी सास को बताया लेकिन सास मानने को तैयार नहीं थी। इस समय उसकी देवरानी मायके से यहां आना-जाना करती थी । क्योंकि उसका मायका उसी शहर का था । देवरानी की शादी हुए कुछ ही महीने हुए थे।और वही रह रही थी । उसकी सास का पूरा ध्यान उसकी देवरानी के ऊपर था। सास उसकी बात मानने को तैयार ही नहीं थी। एक दिन जिद करके उसने अपने पति को डॉक्टर के पास ले गई ।डॉक्टर ने उसको रेस्ट बताया लेकिन घर में तनाव का महौल था। 10 -15 दिन में कोई ना कोई बात को लेकर झगड़ा होते ही रहता था यहां तक की झगड़े में ससुर ने यहां तक कह दिया कि लोगों को बच्चे तो सड़कों पर होते हैं ।देवरानी मायके गई थी ।रिपोर्ट दिखाने के बाद भी रिपोर्ट मैं बेडरेस्ट लिखा है, उस पर किसी का ध्यान नहीं गया। सास ने फिर भी ध्यान नहीं दिया और टाके से नीचे से पानी निकलवाना जारी रखा ।देवरानी के खाने के लिए पुरन बनवाना वह भी सिल पर पिसवाना इससे समस्या और बढ़ गई । ब्लडथोड़ा ज्यादा जाने लगा । सास -देवरानी के साथ रायपुर चली गई घूमने के लिए। वह इस हालत में अपने ससुर अपनाऔर पति का खाना बना रही थी। एक दिन बहुत ज्यादा समस्या हो गई ब्लड ज्यादा जाने लगा उसने फोन करके बताया तो सांस ने उसे ही डाॅंटा, फिर उसे अपने कार्य करने लिए कहां।इस बीच में एक दिन ज्यादा ही तबियत खराब हो गयी तो उसने अपने मायके वालों को बुलाया और मायके चली गई ।
उसके बाद जब सास रायपुर से ल़ोटी तो उसने उसका सूटकेस अन्य सामान लेकर आ गई इसके बाद उसको रायपुर जाने ही नहीं दिया। और उसके पति को यहीं रोक लिया ।वह बिजनेस उसके पति ने खोला था और अपने भाई को पार्टनर बनाया था। लेकिन देवरानी और देवर उस बिजनेस को चलाने लगे।लेकिन केस बिगड़ने के कारण मायके में दो महीने ही बिता पाई थी और ज्यादा समस्या बढ़ गई । इस बीच प्रॉब्लम इतनी ज्यादा थी कि ब्लड रुक ही नहीं रहा था और वह दो-तीन बार अस्पताल में भर्ती हो चुकी थी क्योंकि ब्लड रुके फिर चालू हो जाता रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था । और अस्पताल में ऊपर से ब्लड चढ़ाया जा रहा था बल्ड के साथ ग्लूकोस भी लगा रहे थे। फिर नागपुर लेकर गए बच्चों को बचाने की बहुत कोशिश की गई। लास्ट में 15 दिन के लिए भर्ती भी किया गया और इसी बीच में 5:30 महीने का बच्चा(जो कि लड़का था।) होकर केअबॉर्शन हो गया क्योंकि डॉक्टर ने बेड रेस्ट बताया था । और उसके ससुराल में जैसे ही गर्भ रुका है बताई तो मानने को तैयार नहीं थे, उसके रेस्ट नहीं होने के कारण प्रॉब्लम होने लग गई थी। फिर भी ससुराल वाले समझ नहीं रहे थे और ताने मारने में लगे हुए थे।उसको संभालने के लिए बहुत कोशिश की गई और ऐसे ही करते-करते 5:30 महीने हो गए। ससुराल से देखने कोई नहीं आए और ना पैसे भिजवाए । इतनी मुश्किल होने पर उसकी जान भी जा सकती थी। वहा से ससुराल 4 महीने बाद वापस आने के बाद उसने स्कूल ज्वाइन कर लिया उसके पास पैसे की तंगी रहती थी ।उसे क्या पता था कि, उसके जीवन में इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा ।क्योंकि उसके पति के पास भी पैसे की तंगी थी वह उसके इलाज के लिए पैसे नहीं लगा सकते थे लेकिन उसने हिम्मत नही हारी और शादी के कुछ साल (2005 में) बाद स्कूल मैं पढ़ाना चालू कर दिया ।फिर 6 महीने बाद एक स्कूल में पढ़ाने के बाद गर्भधारण हो गया तो फिर उसने स्कूल छोड़ दी और दो महीने बाद फिर मायके चली गई और वहां पर बेडरेस्ट किया लेकिन इस बार डॉक्टर ने भी दिलासा दिया कि सब कुछ सही है। फुल उल्टा होने के कारण ऐसा है, लेकिन जो देखा बस यही कहता था । आप खतरा मोल क्यों लेते हो ।आपका जीवन है ,तो सब कुछ है। लेकिन उसका मन नहीं मानता था उसने सोच कर रखा था। अगर बच्चे नहीं तो जीवन नहीं उसने सारी मुसीबतो का सामना किया लेटे-लेटे खाना खाया, चाय पीना हर मुसीबत से लड़ती रही और और बेडरेस्ट
किया और पैसे की तंगी भी धीरे-धीरे चलती रही। मायके वाले पूरे पैसे लगाते थे । इस बार भी सातवां महीना लगने ही वाला था, कि डॉक्टर की लापरवाही से 7 महीने की लड़की का अबॉर्शन हो गया और उसे बचाने के लिए कोशिश किया गया। डॉक्टर का कहना था अगर 24 घंटे यह लड़की रहेगी ,तो बच जाएगी ।लेकिन भगवान को यह मंजूर नहीं था और वह भी नहीं बच पाई। उसके बाद फिर वह 3 महीने बाद ससुराल वापस आई 6 महीने बाद फिर उसको गर्भ ठहर गया और फिर उसने वही की जबलपुर की डॉक्टरनी को दिखाया,लेकिन कोई भी डॉक्टरनी नहीं समझ पा रही थी। जबकि नागपुर की डॉक्टरनी ने पहली बार में ही फाइल में लिख दिया था,की क्या समस्या है और वह फाइल सबको दिखाई जा रही थी। और इस प्रकार तीसरी बार भी ढाई महीने का अबॉर्शन हुआ और इसमें बच्चा पेट में ही खत्म होने के कारण सफाई करनी पड़ी । (जो कि वह भी लड़का ही था।)इसके बाद उसने 1 साल गेफ लिया और उसके बाद दूसरे स्कूल ज्वाइन की फिर एक साल उसमें पढ़ाने के बाद उसने फिर 1 साल रेस्ट लिया जबलपुर में ही ट्रीटमेंट चालू कराया। लेकिन वहां की भी डॉक्टरनी ने उस नागपुर की डॉक्टरनी की फाईल देखने के बाद समझ नहीं पाई और उसने एक साल गलत दवाइयां दे दी 1 साल दवाई खाने के बाद फिर वह नागपुर एक बार फिर दिखाने गई।जब नागपुर की डॉक्टरनी से बात करने से पता चला की पहली बार जब नागपुर में दिखाया गया था इस रिपोर्ट में लिख दिया गया था कि क्या समस्या थी। उन्होंने दो डॉक्टरनी का नाम पहले ही दिया था जो जबलपुर में थी। घूमने के बाद उसने उस डॉक्टरनी की खोज की और वह डॉक्टरनी जबलपुर (रामपुर)में चौहान डॉक्टरनी है, उनसे मुलाकात की। इसके बाद 2 साल बाद 2008 में फिर उसने गर्भधारण किया। इसमें पहले महिने से ही चौहान डॉक्टरनी को दिखाया। और बेडरेस्ट भी किया। इस बीच में सास से कुछ महीनो के लिए अलग हो गये।क्योंकि झगड़ा बहुत होने लगा था। टिफीन बाहर से मंगाने लगे। फिर तीन महिने निकालने के बाद उसने अपने पति से जीद किया अब उसे नागपुर में ही इलाज करवाना है। इस तरह नागपुर दिखाने गई ।एक महीने वह अपनी नंनद के यहां रहीऔर कुछ महीने अपने मामा के यहां रही हैं। इस तरह लास्ट के 9 महीने में छोटे से कमरे में रही जहां 5 कमरे और 25 लोग थे एक ही बाथरूम , एक ही नल, और छोटा सा आंगन जिसमें यह सब था। वहां उसके साथ उसकी मम्मी ने समय बिताया। उस समय उसकी मम्मी उसके साथ रही । आज तक उसने छोटे से रूम में कभी नहीं रही, क्योंकि उसके मायके का बहुत बड़ा मकान था। इस तरह बच्चा जो कि पूरा 9 महीना 9 दिन का नागपुर के अस्पताल में 27- 2 -2009 को जन्म लिया । बच्चे के जन्म लेते ही खुशी का कोई ठिकाना नहीं था ।वहीं से अस्पताल से अपने भाई और मम्मी के साथ गाड़ी करके वापस मायके चली गई। इतनी मुसीबत, तानेऔर पैसे की कमी इन सबके के बाद उसने हिम्मत नहीं हारते हुए उसने एक बच्चे को जन्म दे ही दिया। इन सब में उसने उसकी मायके वालों ने कभी हिम्मत नहीं हारी। और चार महीने के बाद मायके से बच्चा लेकर फिर ससुराल वापस आई और फिर 3 साल बाद उसने दूसरे बच्चे के लिए गर्भधारण करने पर 4 महीने में हल्का काम करते हुए उसके बाद बेडरेस्ट लेते हुए सात महीने निकालने के बाद फिर मायके चली गई और दूसरी बच्ची को 23 -1 -2012 जन्म दिया ।आज एक सुखी जीवन दोनो बच्चों के साथ जी रही है।
इस तरह उसने अपने जीवन में संघर्ष किया और एक मां की ममता को साबित कर दिया, कि अपने बच्चों के लिए मां कुछ भी कर सकती। उसने अपने जीवन के 8 साल इसी तरह बिताया।
यह कहानी उन माओ के लिए है जो हिम्मत हार जाती है और इलाज करने के लिए पीछे हट जाती है।
यह कहानी एक सच्ची घटना पर है , इसमें कई बातें तो लिखी भी नहीं गई है ,जो कि उसके साथ बिती थी।उस पात्र का नाम तो यहां लिखा नहीं गया है। लेकिन समझने वालों के लिए इशारा काफी है।
*(वंदना सोनकर/बोरीकर)*
जबलपुर
