मर्दानी
मर्दानी
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तक-तक,ओ-ओ, हेहें ए ए ए चल ललौआ चल ललौआ के सुरीले जनाना आदेश पर बैल भी झूमकर चल रहे थे। पहले जिस खेत को जोतने में पूरा दिन लग जाया करता था, वो खेत आज एक जून में ही निपट गया था।
"घाम बहुत हो गया है बिटिया अब बंद करो बचा खुचा काम शाम में निपटा लेना..." सामने से अपना हल-बैल खोलकर ले जाते हुए साधू काका ने उसे देखकर आवाज लगाई।
“हां काका, एक कूंड़ (चक्कर) बचा है उसे निपटा लूं बस चलना तो है ही” इतना कहते हुए उसने आखिरी चक्कर के लिए बैलों को घुमा दिया।
घरमुहाँ बैल हों या परदेशी आदमी उन्हें सम्हालना कोई बच्चों का खेल नहीं होता, कूंड़ खत्म होते ही उसने हांव-हांव कहके बैलों को रोंका पर जैसे ही हल को जुआठे से खोलने के लिये आगे की ओर चली बैल दौड़ पड़े। वो चार कदम भी नहीं दौड़े थे कि हल का फाल उछल कर दाहिने वाले बैल के पैर में समा गया। वो बिदका और खींचकर भागने लगा तब तक हल बांये वाले बैल के पैर में भी समा गया। खून की तेज धार दोनों बैलों के पैरों से बहने लगी। औरत जात खून को देखते ही अपना आपा खो बैठी, वह थोड़ी देर तो किंकर्तव्यविमूढ़ दोनों लहूलुहान बैलों को खड़ी होकर देखती रही फिर जैसे-तैसे खुद को सम्हाला और उन्हें लेकर घर की ओर चल पड़ी।
आगे आगे मर्दानी बैलों की रस्सी पकड़े चल रही थी और पीछे-पीछे लंगड़ाते हुए उसके दोनों बैल। सूरज से आंखे चार करते हुए उसके ऊपरी सौंदर्य पर तो काली पपड़ियाँ पर चुकी थीं पर कपड़ो से हमेशा ढके रहने वाले अंग जो हाथों को इधर-उधर करते समय यदा-कदा उघड़ जाया करते थे। बादलों के बीच में बिजली की सी छटा बिखेर रहे थे।
शुरू से ऐसी तो नहीं थी सावित्री। हां जीवट थी पर उसने कभी काम करने के नाम पर खेत का मुंह नहीं देखा था। आखिरकार वो पांच हट्टे-कट्टे भाइयों की इकलौती बहन जो थी। पर शादी के सातवें साल में ही पति की सांप काटने से मौत हो जाने बाद समय के हिसाब से वह धीरे-धीरे ऐसी होती चली गई।
बेवा हो जाने के बाद ढाढस तो सबने बंधाया था, कि कोई भी काम हो तो बेहिचक बताना पर आज के समय में किसी की मदद करने के लिए किसी के पास वक्त ही कहाँ है। एक बार जब वो अपने ही बड़े भाई पास खेती किसानी से संबंधित कुछ मदद के लिये बड़ी आस लेकर गई थी। तभी उसे अपनी भाभी बना हुआ मुंह ऐसा खटका कि उल्टे पाँव वापस आ गई। और उसी वक्त से उसने अपने सिर के पल्लू को कमर में बांधना शुरूं कर दिया। घर आकर उसने सबसे पहले आईने को पटककर तोड़ दिया और पति के गमछे को सिर में बांधते हुए कसम खाया कि भूखी मर जाएगी पर अब से किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगी।
कुदाल चलाना खेत जोतना और बैलगाड़ी चलाने जैसा भदेस मर्दाना काम कुछ दिनों तक तो गांव वालों को खटका पर धीरे-धीरे वो इलाके में मर्दानी के नाम से जानी जाने लगी।
हालांकि वो पढ़ाई के नाम पर बस पांचवी जमात तक ही पढ़ी थी पर गांव की महिलाओं के सामने वो बड़े फक्र से कहा करती थी, "पांच किताबें पढ़ रखी हैं मैंने" और वो सब कनवा घूँघट (जिसमें कान के बराबर मुंह ढका रहता है) के नीचे शर्मा कर रह जातीं।
साधू काका तो जैसे ट्यूबबेल पर बैलों को बांधकर उसका ही इंतजार कर रहे थे।
“आओ-आओ सावित्री, क्या हुआ बैल काहे लंगड़ा रहे हैं?”
“कुछ नहीं काका, बस हल लग गया है।” सावित्री ने थकी हुई जबान में उत्तर दिया।
साधू काका दौड़कर आये और बैलों के पैर को देखने के बहाने बीच राह में ही उकड़ू बैठकर सावित्री को निहारने लगे।
“थोड़ा आराम कर लो सावित्री, नल से जूड़ (ठंडा) पानी निकालो और सतुआ नमक अंदर रखा है लेकर खा लो फिर आराम करो, वैसे भी यहाँ दोपहर में कोई आता नहीं है।” साधू काका ने टेढ़ी नजरों से उसे देखते हुए अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा।
उनका मकसद तो सावित्री समझ गई थी, पर वह पेड़ के नीचे जुड़ाना तो चाहती थी। लेकिन साधू काका की असाधु नजरों से भी बचना चाहती थी। हर औरत के पास एक छठी इंद्रिय कहूं या तीसरी आंख भी होती है। जिससे वह पर पुरुष की मानसिकता तुरंत पढ़ लेती है। सामने खेल रही केंचुल को अगर समय रहते न कुचल दिया जाय तो इसके कोबरा बनने में ज्यादा समय नहीं लगता है।
"मैं तो बैठ जाती हूँ काका पर अभी-अभी मैंने देखा कि तुम्हारी बड़की बिटीवा मेरे बगल वाले गन्ने में गई है। पहले तो मैंने सोंचा कि ऐसे ही कोई शुबहा लगा होगा पर बाद में जब मैंने मनोहर को भी उधर ही घुसते हुए देखा तो कान खड़े हो गये मैं तुरंत वहां से भागी कि तुमको खबर कर दूं पर इसी चक्कर में बैलों जो नसी(हल का फाल) भी लग गई।
सावित्री ने बैलों को पेड़ के नीचे बांधकर नल पर जाकर हाथ मुंह धोया और आँचल से मुँह को पोछते हुए सामने के चकरोड पर देखने लगी, साधू काका उसी गन्ने के खेत की ओर दौड़े चले जा रहे थे।
