कलावती आनंद चौधरी
बहुत समय पहले किसी गांव में एक मध्यमवर्गीय हिंदू परिवार रहता था। जिसमें कूल मिला कर सिर्फ तीन सदस्य रहते थे। घर का अधेड़ मुखिया नारायण साहू, उनकी पत्नी देविका साहू और उनका एकमात्र अविवाहित बेटा निरंजन साहू। निरंजन की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में बतौर सुपरवाइजर नौकरी थी, जिसके सिलसिले में वो कदरन घर से दूर आउटसिटी ही रहता था। जहां से चार-छह महीने में कभी-कभार छुट्टी लेकर दस-बीस दिनों के लिए घर पर उसकी आमद हो पाती थी। एक बार ऐसे ही लगभग छः महीने बाद उसकी घर वापसी हुई थी। उसी दरम्यान एक रात उसके घर में एक बड़ी ही विचित्र घटना घटी।
🌑🌑🌑
अपने कमरे में सोई देविका को नींद में ऐसा लगा, जैसे बाहर बरामदे में कोई एकदम धीमी आवाज में खुसुर-फुसुर बात कर रहा था। कच्ची नींद में उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की तो उस खुसुर-फुसुर में उसे एक आवाज किसी जनाना की लगी।
और
फिर तत्काल उसकी नींद खुल गई। अपनी आंखें पट से खोल दी उसने।
नजर तुरंत
दीवार पर लगी वॉल क्लॉक की तरफ घूमी। तब वॉल क्लॉक में रात के डेढ़ बज रहे थे।
मतलब रात्रि के दो पहर बीत चुके थे। और उस वक्त चारों तरफ एक गंभीर सन्नाटा पसरा
हुआ था।
जैसे
किसी विषधर ने अपना चौड़ा फन उठाया हो, उस वक्त देविका के
जेहन में सवाल उठा।
रात
के डेढ़ बजे घर में कौन खुसुर-फुसुर कर रहा था?
क्या
घर में बाहर से चोरी करने की नापाक मंशा लेकर चोर घुस आए थे?
लेकिन
कैसे?
घर
का मुख्य दरवाजा तो वो सोते समय अंदर से बंद कर के सोई थी। मुख्य दरवाजे के सिवाय
ऐसा कोई भी रास्ता नहीं था जिससे होकर बाहर से घर के अंदर दाखिल हुआ जा सके। कहीं दीवार
में सेंध लगा कर चोर अंदर तो नही घुस आए थे?
जानने
के लिए वो धीरे से बिस्तर पर उठ कर बैठ गई। और अपने बगल में सोये अपने पति पर एक
निगाह डाली।
उसके
पति नारायण साहू तब उसके पहलू में दिन-दुनिया से बेखबर गहरी
नींद में सो रहे थे।
देविका
आहिस्ते से बिस्तर से नीचे उतरी। नीचे उतर कर आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए वो दरवाजे
तक पहुंची। और दरवाजे से कान लगा कर उसने बाहर से आ रही आवाजें सुनने की कोशिश की।
बाहर
से अब भी दो जनों के आहिस्ते-आहिस्ते बतियाने की आवाजें आ रही थी। ध्यान से सुनने
पर उसे उन दोनों आवाजों में एक जनाना आवाज लगी।
देविका
ने एकदम आहिस्ते से कुछ इस तरह दरवाजे की चिटकनी खोली, कि उसकी आवाज बाहर मौजूद लोगों को सुनाई न दे। चिटकनी खोल कर उसने धीरे से
दरवाजे को अपनी तरफ अंदर खींचा। अंदर खींच कर दरवाजे में थोड़ी सी झिर्री बनाई,
और उसी झिर्री से आंख लगा कर उसने बाहर झांका।
बाहर
पूरा बरामदा और आंगन अंधेरे में डूबा हुआ था। इसके बावजूद साफ पता चल रहा था कि
बाहर बरामदे और आंगन में कहीं कोई मौजूद नही था।
अब
देविका ने दरवाजे को थोड़ा और अंदर खींचा। और जब दरवाजे में आदमी के गुजरने लायक
जगह हो गई तो उसने बेहद सावधानी से दरवाजे को पार करते हुए बाहर बरामदे में कदम
रखा।
बाहर
निकल कर उसने सबसे पहले कान लगा कर ये सुनने की कोशिश की, कि वो आवाजें किधर से आ रही थी?
और
जब उसे ये पता चला कि वो आवाजें किधर से आ रही थी तो वो सन्न रह गई ! निगाहें
तत्काल अपने कमरे के सामने स्थित उस दूसरे कमरे के सामने पड़ी, जिस कमरे के अंदर उसका इकलौता बेटा निरंजन सोया था। आवाजें उसी कमरे के
भीतर से आ रही थी।
एक
क्षण के लिए देविका के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई। पूरी बात समझते उसे देर न
लगी।
आवाजें
उस कमरे के अंदर से आ रही थी। मतलब अंदर कमरे में उसका अविवाहित बेटा निरंजन किसी महिला
या लड़की के साथ चोरी-छिपे खुसुर-फुसुर बतिया रहा था। जाहिर था कि पड़ोस
की किसी चरित्रहीन महिला या लड़की के साथ उसके नाजायज जिस्मानी ताल्लुकात थे।
कुछ
देर तक देविका के पैर जैसे वहीं जमीन में फ्रीज होकर रह गए थे। दिलो-दिमाग में विचारों
की तेज आंधियां चलने लगी। बड़ी देर तक वो वहीं खड़ी न जाने क्या-क्या
सोचती रही। फिर वापस आकर अपने बिस्तर पर लेट गई। उस रात देविका को दोबारा सुबह तक नींद
नही आई।
🌑🌑🌑
सुबह
एकांत पाकर देविका ने ये बात अपने पति नारायण साहू को बताई। सुन कर वो भी हतप्रभ
रह गए। आश्चर्य के मारे दो मिनट तक उनके हलक से बोल न फूटे।
कुछ
देर बाद जब उनके होशो-हवास काबू में आए, हैरत भरे स्वर में
बुदबुदाते हुए उन्होंने देविका से पूछा–“तुमने आवाज से
पहचानने की कोशिश नहीं की, कि निरंजन के साथ उसके कमरे में
कौन थी?”
“नही
पता चला।”-देविका खीझते हुए बोली-“और वैसे
भी जवान बेटे पर कब तक निगाह रखेंगे? लड़का शादी के लायक सयाना हो चुका है। समय पर
जहां जिस चीज की जरूरत पड़े, मुहैया करा देना बेहतर होता है।
समय पर पानी न मिले, तो पेंड़-पौधे भी सूख जाते हैं। सो बेहतर
होगा, अब एक अच्छी सी लड़की देख कर उसका ब्याह कर देते हैं।”
नारायण
साहू ने सहमति में सिर हिलाते हुए पूछा–“मैं आज से ही उसके
लिए लड़की देखना शुरू कर देता हूं। लेकिन अभी क्या किया जाए जिससे वो व्याभिचार का
गलत रास्ता छोड़ दे?”
देविका
सोंचने लगी। फिर एकाएक वो अपने पति से बोली-“हमलोगों के सोने के
बाद निरंजन उस छिनाल के लिए दरवाजा अंदर से खोलता होगा। या ये भी हो सकता है कि वो
उसकी चोरी-छिपे आमद के लिए पहले से ही दरवाजा खुला छोड़ देता होगा।”
“तो?”-नारायण
साहू की आंखें तनी।
देविका
ने उपाय सुझाया-“तो रात को सोते समय क्यों न मेन गेट अंदर से बंद करके
वहां ताला लगा दिया जाए? चाबी रात भर हमलोगों के पास होगी। उस स्थिति में निरंजन
लाख चाह कर भी उस महिला या लड़की के लिए अंदर से दरवाजा नही खोल पाएगा। और इस तरह
उन दोनों के व्याभिचार पर अंकुश लग जाएगा।”
“बढ़िया।”-सुन
कर नारायण साहू संतुष्ट हो गए।
🌑🌑🌑
अगले
दिन रात को जब निरंजन सोने के लिए अपने कमरे में घुसा, उसी समय देविका दबे पांव घर के मुख्य दरवाजे के पास गई। नजर सीधे दरवाजे
के कुंडी पर पड़ी। और उसका शक सही निकला।
दरवाजे
के दोनों पल्ले सटे हुए थे, जिसे दूर से देखने पर दरवाजे के बंद होने का भ्रम
पैदा होता था। जबकि अंदर से उसकी कुंडी खुली थी। उस स्थिति में बाहर से कोई आदमी
आकर बड़ी सहूलियत से दरवाजे को खोल कर अंदर आ सकता था।
देविका
ने पहले धीरे से कुंडी लगाई, और उपर से ताला लगा दिया। वापस
आकर चाबी अपने बेडरूम में तकिए के नीचे रखा। दिन भर की थकान से उसके पति बहुत पहले
सो चुके थे। देविका आहिस्ते से उनके बगल में बिस्तर पर लेट गई।
बिस्तर
पर लेट कर वो सोंचने लगी।
क्या
निरंजन आज भी उस लड़की या महिला को घर में बुलाने वाला था? अगर हां, तो कैसे? मुख्य दरवाजे पर तो ताला लग चुका था। क्या वो किसी और तरीके से उसे
घर के अंदर दाखिल कराता?
लेकिन
कैसे? मुख्य दरवाजे के सिवाय ऐसा कोई भी रास्ता नहीं था जिसके जरिए चोरी-छिपे बाहर
से घर के अंदर दाखिल हुआ जा सके।
तो
ऐसे में ज्यादा संभावना इसी बात की थी कि मुख्य दरवाजे पर ताला लगा देख कर वो अपना
इरादा बदल देता।
बढ़िया।
खुब बढ़िया।
देविका
ने निश्चित होकर अपनी आंखें मूंद ली। जेहन में चल रहे सोचों को विराम दिया, और सोने की कोशिश करने लगी।
धीरे-धीरे
उसका दिमाग शिथिल होता गया और वो नींद के आगोश में खोने लगी।
कि
तभी अचानक,
“ही.. ही.. ही.. ही.. ही..।”
बाहर
से एक बहुत ही धीमी और मधुर सी जनाना खिलखिलाहट की आवाज आई।
देविका
यूं अपने बिस्तर पर उछल पड़ी, जैसे उसने अपने बिस्तर पर कोई
सांप देख लिया हो। एक सेकेंड में ही उसकी सारी आलस और नींद एक झटके से गायब हो गई।
बाहर
से ये कैसी खिलखिलाहट की आवाज आ रही थी?
पहले
तो उसे ऐसा लगा कि नींद में उसे कोई भ्रम हुआ था। मगर ध्यान से सुनने पर उसे
साफ-साफ किसी जनाना के हंसने की आवाज सुनाई दी।
वो
तत्काल बिस्तर से नीचे उतरी। नीचे उतर कर वो झपटते हुए दरवाजे पर पहुंची, और अपना दाहिना कान दरवाजे से सटा कर बाहर की आहट लेने की कोशिश करने लगी।
कान
लगा कर ध्यान से सुनने पर साफ पता चला। निरंजन के कमरे से आहिस्ते-आहिस्ते खिलखिलाने
और बतियाने की खुसुर-फुसुर आवाज आ रही थी।
सुन
कर देविका सन्न रह गई। दिमाग भक्क से उड़ कर अंतरिक्ष में नाचने लगा।
जेहन
में हथौड़े की तरह एक ही सवाल बजा। जब सोते समय उसने खुद अपने हाथों से मेन गेट पर
ताला लगाया था, तो उसके बाद भी कोई जनाना घर के अंदर कैसे दाखिल हो
सकती थी?
क्या
किसी तरह निरंजन ने मेन गेट पर लगा हुआ ताला खोल लिया था? लेकिन कैसे? ताले की
एकमात्र चाबी तो अब भी देविका के बिस्तर पर तकिए के नीचे रखी हुई थी।
मेन
गेट के अलावा और कोई रास्ता नही था, जिसके जरिए बाहर से
कोई चोरी-छिपे घर के अंदर दाखिल हो पाता।
तो
फिर जिस जनाना के खुसुर-फुसुर की आवाज वो सुन रही थी, वो
जनाना घर के अंदर दाखिल कैसे हो गई?
क्या
माजरा था?
लाख
सोंचने पर भी देविका को कुछ समझ में नही आया। सस्पेंस के मारे उसके जेहन में जैसे
सीटीयां सी बज रही थी। जी में आया कि अभी जाकर वो निरंजन का दरवाजा खटखटाए, और दरवाजा खुलवा कर देख ले कि उसका बेटा रोज रात को चोरी-छिपे किस बदजात
को घर के अंदर बुला रहा था?
पर
जवान बेटे का लिहाज करके वो रूक गई। दिमाग में उसी वक्त ये ख्याल भी आया कि अब मेन
गेट के लॉक हो जाने की सूरत में वैसे भी अंदर कमरे में घुसी जनाना का बाहर निकलना लगभग
नामुमकिन था। और उसके बाहर ना निकल पाने की सूरत में उसका पकड़ा जाना महज कुछ घंटों
की बात थी।
ये
सोच कर देविका एक बार फिर से निश्चित हो गई। उसके कदम वापस अपने कमरे की तरफ मुड़े।
और वो अपने कमरे में घुस कर बिस्तर पर लेट गई। बिस्तर पर लेटने के बाद भी उसके
दिमाग में हथौड़े की तरह एक ही सवाल गूंज रहा था।
बिना
दरवाजा खोले किसी आदमजात की घर के अंदर-बाहर आवा-जाही भला कैसे मुमकिन थी?
🌑🌑🌑
सुबह
होते ही देविका सबसे पहले मेन गेट की तरफ भागी। जाकर देखा तो मेन गेट पर ताला जस
का तस लगा हुआ था, जैसे उसने रात में लगाया था।
मतलब
वो जनाना अभी इसी घर में कहीं छुपी हुई थी। सबसे पहले उसने पूरा घर, यहां तक कि घर का कोना-कोना तक छान मारा। मगर कहीं से कोई लड़की या औरत बरामद
नही हुई।
अब तलाशी
लेने के लिए सिर्फ एक जगह बची हुई थी।
निरंजन
का कमरा।
और मेन
गेट बंद होने की सूरत में हो न हो, वो जनाना इस वक्त
निरंजन के कमरे में ही छुपी हुई थी। देविका जाकर उसके कमरे के दरवाजे के सामने
खड़ी हुई। इस वक्त उसका दिल जोर-जोर से धक-धक धड़क रहा था। दरवाजा खुलने भर की देर
थी। दरवाजे के खुलते ही वो जनाना पकड़ी जाने वाली थी।
धड़कते
दिल से देविका ने हाथ आगे बढ़ा कर निरंजन का दरवाजा खटखटाया।
दो-तीन
बार दरवाजा खटखटाए जाने के बाद अंदर से दरवाजा खुला। और खुले दरवाजे पर आंखें मलता
हुआ निरंजन प्रकट हुआ।
उनींदे
स्वर में उसने देविका से पूछा-“क्या हुआ मां? इतनी जोर-जोर से
दरवाजा क्यों पीट रही हो?”
देविका
ने जैसे निरंजन की बात सुनी ही नही थी। उसने खुले दरवाजे से भीतर कमरे में देखा।
और वो ये देख कर बुरी तरह चौंक उठी कि कमरे में कही कोई लड़की या औरत नही थी।
देविका
का दिमाग बुरी तरह से चकरा उठा। कानों में जैसे सांय-सांय सीटीयां बजने लगी।
और
दिमाग में हथौड़े की तरह फिर से ये सवाल गूंजा। मेन गेट पर अभी तक ताला झूल रहा था, तो वो जनाना बिना दरवाजा खोले घर से बाहर कैसे निकल गई?
ऐसे
तो भूत-प्रेत बिना दरवाजा खोले ताले के छेद या खिड़की के रास्ते अंदर-बाहर आते-जाते
हैं।
देविका
अभी आश्चर्य के सागर में गोते लगा रही थी कि निरंजन ने एक बार उसका कंधा पकड़ कर
झिंझोड़ा।
“मां… मां ।”
देविका
जैसे बेहोशी से होश में आई। हकबकाते और हड़बड़ाते हुए उसने निरंजन की तरफ देखा-“आं… हां ..हां ।”
“मां
।”-निरंजन ने देविका की तरफ ध्यान से देखते हुए अपना सवाल दोहराया-“मैंने पूछा कि आप इतनी हड़बड़ा कर मेरे कमरे का दरवाजा क्यों पीट रही थी?”
“क… कुछ.. कुछ नही।”-देविका
हड़बड़ा कर संभलते हुए बोली-“वो क्या है कि चाय ठंढी हो
जाएगी। तु जल्दी से आ जा, चाय पीते हैं।”
“ठीक
है मां ।”-निरंजन अ-संतुष्ट लहजे में बोला।
पांच
मिनट बाद देविका, नारायण साहू और निरंजन तीनों आंगन में कुर्सियों पर बैठे
हुए थे। तीनों के हाथ में इस वक्त चाय से भरे हुए कप थे।
देविका
और उसके पति दोनों हाथ में कप थामे लगातार निरंजन को घूरे जा रहे थे। अपने मां-बाप
को यूं अपनी तरफ एकटक से घूरता देख कर निरंजन सकपकाया।
“क… क्या हुआ?”-सकपकाते हुए उसने देविका से पूछा। जवाब
में देविका धीरे से किंतु बेहद सर्द लहजे में बोली-“तुमसे एक
सवाल पूछना है।”
“मुझसे?”-निरंजन
एक बार फिर से सकपकाया-“क… कौन सा
सवाल?”
देविका
पुर्ववत अपने बेटे को घूरते हुए बोली-“बहुत आसान सा सवाल
है। बस तुझे उसका सही-सही जवाब देना है।”
निरंजन
सावधान हो गया-“ठीक है, पूछिए।”
देविका
ने पूछ लिया-“कल रात को सोने के बाद तुमने दोबारा मेन गेट खोला था?”
सवाल
सुन कर निरंजन सकपकाया-“क… क्यों, क्यों पूछ रही हो आप?”
“सब
समझ जाओगे।”-देविका बोली-“पहले तुम मेरे सवाल
का सही-सही जवाब दो।”
निरंजन
ने जवाब देते हुए इन्कार में सिर हिलाया-“नही, सोने के बाद मैं मेन
गेट की तरफ गया भी नही था।”
जवाब
सुन कर देविका बोली-“तब तो तुम ये जान कर बुरी तरह चौंक जाओगे कि तुम्हारे
सोने के तुरंत बाद मैंने मेन गेट पर ताला लगा दिया था।”
“क्या?”-जान
कर सचमुच निरंजन बुरी तरह चौंक उठा। कप लिए होंठों तक जा रहे उसके हाथ जैसे रास्ते
में ही फ्रीज हो गए। आश्चर्य की अधिकता से उसका मुंह खुला का खुला ही रह गया।
बुरी
तरह हकबकाते हुए उसने पूछा-“आ.. आप सच कह रही हो?”
चाय
की चुस्की लेते हुए नारायण साहू ने ध्यान से उसके चेहरे को देखा-“शहर जाकर चार पैसे कमाना सीख गए, तो अब तुम्हें अपनी
मां की जुबान पर भी ऐतबार नही रहा?”
जवाब
पाकर निरंजन के चेहरे पर जमाने भर का आश्चर्य उभर आया। अविश्वसनीय स्वर में वो
बुदबुदाया–“न… नही, ऐसा..
ऐसा कैसे हो सकता है?”
“क्या?”-सब
कुछ समझ रही देविका ने अनजान बनते हुए पूछा-“क्या ऐसा कैसे
हो सकता है?”
निरंजन
ने बताने के लिए मुंह खोला, मगर दिमाग में चल रहे कशमकश के कारण उसके होंठों से
बोल न फुटे। वो पहलू बदलते हुए अपनी मां से नजरें चुराने लगा।
देविका
ने तनिक उच्च स्वर में उससे दोबारा पूछा–“बोलो, ये तो तुम ही बता सकते हो कि ऐसा कैसे हो सकता है? मेन गेट पर मैंने खुद
अपने हाथों से ताला लगाया था। ऐसा कोई रास्ता भी नही है जिसके जरिए चोरी-छिपे बाहर
से कोई आदमजात घर के अंदर दाखिल हो सके। तो बिना ताला और दरवाजा खोले कोई औरत कैसे
तुम्हारे कमरे में अंदर आ गई? और अल सुबह बिना ताला खोले बाहर भी निकल गई।”
सब
कुछ आईने की तरह साफ़ हो चुका था। निरंजन का चेहरा अपने मां-बाप के सामने शर्म से
झुक गया।
शर्म
से वो कुछ न बोल सका। अलबत्ता उसके चेहरे पर शर्म के साथ अब भी आश्चर्य के भाव
पसरे हुए थे। और उसके माथे पर मौजूद लकीरें बता रही थी कि अपने दिमाग में उठे सवाल
का जवाब पाने के लिए वो बहुत दिमागी कसरत कर रहा था।
कुछ
क्षण के बाद जब निरंजन ने अपना चेहरा उपर उठाया, तो देविका पूछ बैठी–“कौन थी वो?”
जवाब
देने की बजाय निरंजन हिचकिचाया।
देविका
ने एक बार कड़क कर पूछा-“मैं पूछ रही हूं कि कौन है वो बदजात, जो रोज रात को तुम्हारे कमरे में चोरी-छिपे आती है?”
अपनी
मां के तेवर देख कर निरंजन के मुंह से निकल गया-“क… कलावती ।”
“वो … वो अपने पड़ोस की कलावती ।”
नाम
सुन कर देविका अपनी कुर्सी पर से यूं उछल पड़ी। जैसे उसने अपने पैर के पास कोई
बिच्छू देख लिया था। वो यूं बुरी तरह से चौंकी कि चाय का कप उसके हाथ से
छूटते-छूटते बचा।
उसके
पिता नारायण साहू की भी आंखें आश्चर्य के मारे फैल गई ।
अपने
मां-बाप के रिएक्शन पर निरंजन सकपकाया-“आप… आपलोग कलावती का नाम
सुन कर यूं बुरी तरह से चौंक क्यों गए?”
जवाब
में देविका ने चाय का कप जमीन पर रखा, और एक झटके से उठ
खड़ी हुई।
मेन
गेट की तरफ बढ़ते हुए वो उत्तेजित स्वर में बोली-“मेरे पीछे आओ, तुम्हें सब कुछ पता चल जाएगा।”
नारायण
साहू भी उठ कर अपनी पत्नी के पीछे हो लिए। सस्पेंस में डूबा हुआ निरंजन भी तत्काल उन
दोनों के पीछे उठ कर झपटा।
दो
मिनट के बाद ही देविका निरंजन को लेकर पड़ोस में कलावती के घर पहुंच गई।
कलावती
के घर पर तब सिर्फ उसकी बुढ़ी मां मौजूद थी। देविका अपने पति और निरंजन को लेकर
सीधे घर के अंदर दाखिल हुई।
घर
के अंदर दाखिल होकर वो एक कमरे के दरवाजे पर खड़ी हुई। उस कमरे का दरवाजा तब खुला
था।
देविका
ने निरंजन को अंदर कमरे में देखने का इशारा किया।
और
कमरे के अंदर देखते ही निरंजन आश्चर्य के मारे जमीन से दो फीट उपर उछल पड़ा। उसकी आंखें
आश्चर्य से फट पड़ी।
🌑🌑🌑
रात के तकरीबन ग्यारह बजे निरंजन अपने कमरे में घुसा। देविका के निर्देश पर आज भी मेन गेट खुला रखा गया था। निरंजन अपने कमरे में बिस्तर पर लेट कर कलावती का इंतजार करने लगा।
इंतजार
करते हुए उसका कलेजा इस वक्त जोर-जोर से धक-धक कर रहा था। जरा सी आहट होती तो वो
सहम कर दरवाजे की तरफ देख ले रहा था।
और लगभग
दस मिनट बाद,
दरवाजे
पर किसी के कदमों की एक हल्की सी आहट उभरी। दरवाजा तब खुला था। निरंजन ने तुरंत
पलट कर दरवाजे की तरफ देखा।
रात
की चांदनी रौशनी में दरवाजे पर बाहर से एक इंसानी आकृति की परछाईं उभरी। निरंजन का
दिल जोर जोर से धड़कने लगा। इतनी जोर से कि इस वक्त वो आराम से अपने दिल की धड़कन
सुन पा रहा था।
अंधेरे
में निरंजन ने आंखें फ़ाड़ कर देखा। दरवाजे पर एक महिला आकृति प्रकट हुई थी।
निरंजन
समझ गया कि वो कलावती ही हो सकती थी। वो तुरंत अपने बिस्तर पर उठ कर बैठ गया।
तब
तक दरवाजे पर खड़ी महिला आकृति आहिस्ते-आहिस्ते संतुलित कदमों से चलती हुई निरंजन
के बिस्तर तक पहुंची।
निरंजन
ने अंधेरे में बेड साइड टेबल पर हाथ से टटोल कर माचिस बरामद की। माचिस से एक तीली
निकाल कर उसने सुलगाई। और उस जलती हुई तीली को अपने सामने खड़ी आकृति के चेहरे के
पास ले गया। जलती हुई तीली की पीली सी रौशनी में उस आकृति का भावहीन चेहरा चमक
उठा। वो कलावती ही थी।
वही
गोल-मटोल सुंदर सा चेहरा। सीप सी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें।
कंधे
पर नागिन सी फैली हुई जुल्फें।
निरंजन
ने उसी जलती हुई तीली से बेड साइड टेबल पर रखा दीया जलाया। दीया के जलते ही कमरे
में दीये की पीली मद्धम सी रौशनी फैल गई।
अब
निरंजन और कलावती दोनों एक दूसरे को खुब अच्छी तरह से देख सकते थे। दोनों ने एक
दूसरे को देख कर धीरे से मुस्कुराया।
मध्यम
कद और दोहरे बदन की कलावती मुस्कुराती हुई आगे बढ़ कर निरंजन के पास बिस्तर पर बैठ
गई।
निरंजन
ने धीरे से उससे पूछा-“यहां आते हुए रास्ते में तुम्हें किसी ने देखा तो
नही?”
कलावती
मुस्कुराते हुए फुसफुसाई-“इतनी रात को अब कौन जगा हुआ है, जो मुझे देख लेगा? और अगर किसी ने अंधेरे में देख भी लिया तो वो ये कैसे
जान पाएगा कि ये कलावती है। वो सिर्फ ये देख पाएगा कि कोई जनाना है। और जब तक कोई
मुझे पहचान नही लेगा, तब तक बात मेरे घर नही पहुंचेगी।”
“बिल्कुल
।”-निरंजन ने पूछते हुए कलावती के चेहरे को ध्यान से देखा-“लेकिन मान लो, बदकिस्मती से अगर किसी ने तुम्हें
कलावती के तौर पर पहचान लिया तो?”
एक
क्षण, सिर्फ एक क्षण के लिए निरंजन के सवाल पर कलावती सकपकाई, फिर उसने लापरवाही से जवाब दिया-“तो क्या? वो जाकर
मेरे घरवालों को बोल देगा। और मेरे घरवाले मेरी धुनाई
करेंगे। बहुत हुआ तो मुझे मार डालेंगे।”
“कैसे?”-निरंजन
ने कलावती को घूरते हुए पूछा-“कैसे मारेंगे? गला दबा कर? तब
तक जब तक कि छटपटाते हुए तुम्हारे प्राण न छूट जाए। तुम्हारी जीभ और आंखें बाहर की
तरफ न उबल पड़े।”
जवाब
में कलावती एकटक से निरंजन को देखने लगी।
“और”-निरंजन
आगे बोला-“तुम्हें मार कर तुम्हारी लाश पता है, वे लोग कहां छुपाएंगे?”
पूछने
की बजाय कलावती अब भी निरंजन को एकटक से देखे जा रही थी।
निरंजन
आगे बोलता रहा-“तुम्हारी लाश को वे लोग नदी के किनारे रेत में गाड़
देंगे। उधर ही … जिधर … जिधर लाशें
जलाई जाती है।”
एकाएक
कलावती उठ कर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर से सारी हंसी मुस्कुराहट अब गायब हो चुकी
थी।
निरंजन
भी उठ कर उसके सामने खड़ा हो गया-“तुम्हारा भांडा फूट चुका है दुष्ट
चुड़ैल। इंसान होने का नाटक करना अब तू छोड़ दे।”
जवाब
में कलावती के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे। आश्चर्य से मुंह बाए वो निरंजन को
देखती रह गई।
उसकी
उस अवस्था का भरपूर मजा लेता हुआ निरंजन बोला-“इस वक्त तुम ये सोच
रही हो कि तुम्हारी हकीकत मुझे कैसे पता चली?”
कलावती
के मुंह से सवाल अनायास ही निकला-“कैसे पता चली?”
“दो
दिन से मां हमारे दरम्यान हो रही खुसुर-फुसुर सुन रही थी। कल उन्होंने
मेन गेट पर ताला लगा दिया था। बावजूद इसके रात में मेरे सोने के बाद तुम घर से
बाहर निकल गई। मां ये देख कर चौंकी, कि भला कोई इंसान का
बच्चा बिना दरवाजा खोले घर से बाहर कैसे निकल सकता था? उन्होंने मुझसे पूछा कि
मुझसे मिलने रोज रात को कौन आती है? मैंने तुम्हारा नाम बताया तो वो फिर से बुरी
तरह चौंक उठी। जब मैंने उनसे पूछा कि तुम्हारा नाम सुन कर वो क्यों चौंक गई? जवाब
में वो मुझे तुम्हारे घर लेकर गई। जहां मैंने देखा कि तुम्हारे कमरे में दीवार पर
तुम्हारी फोटो टंगी हुई थी, जिस पर हार लगी हुई थी। मैं सब
कुछ समझ गया था। आगे मुझे वहीं से पता चला कि आज से तीन महीने पहले ही तुम्हारी
चरित्रहीनता से तंग आकर तुम्हारी ऑनर किलिंग कर दी गई थी। मरते वक्त तुम दो महीने
के पेट से थी। सो अकाल मौत मरने के बाद अब तुम चुड़ैल बन चुकी हो।”
सारी
बात समझ कर कलावती ने एक ठंढी सांस ली। उसके चेहरे पर मौजूद भाव में परिवर्तन हुए।
हंसी-मुस्कुराहट की जगह अब उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कुराहट उभरी।
“तुम्हें
पता है?”-कलावती मुस्कुराते हुए बोली-“एक
चुड़ैल को सबसे ज्यादा क्या पसंद होता है? ताजा-ताजा इंसानी
खून पीना। लेकिन मेरे दिल में तुम्हारा खून पीने का कभी ख्याल नही आया।”
“वो
इसलिए क्योंकि”-निरंजन ने कारण बताया-“तुम्हें
सैक्स की जबरदस्त लत लग चुकी है। मेरा इस्तेमाल करके तुम अपनी सैक्स की भूख शांत
करती हो।”
“क्या
बुराई है इसमें?”-कलावती सैक्सी अंदाज़ में होंठ बिचकाते हुए पूरी
बेशर्मी से बोली-“क्या तुम्हें ये सब पसंद नही है? जरूर
होगा। तो ये सिलसिला यूं ही चलते रहने दो ना।”
निरंजन
ने इन्कार में कुछ न कहा।
कलावती
बल खाते हुए निरंजन की तरफ बढ़ी।
कलावती
को अपनी तरफ आते देख कर निरंजन एकदम से सतर्क हो गया।
निरंजन
के एकदम से नजदीक पहुंच कलावती एक बार मुस्कुराई, और फिर उसने निरंजन
को अपने आगोश में भर लिया।
आलिंगन-बद्ध
होकर वो निरंजन के कान में फुसफुसाई-“मेरे करीब आने की कीमत चुकानी
पड़ेगी तुम्हें। खून पी जाउंगी मैं तुम्हारा।”
निरंजन
के हाथ कलावती की नग्न पीठ पर फिसलने लगे। कलावती के कान में वो भी फुसफुसाया-“प्यास बुझनी चाहिए तुम्हारी, चाहे मेरे खून का
कतरा-कतरा चूक जाए।”
एकाएक
कलावती की आंखों में एक शैतानी चमक उभरी, और उसने मुंह खोल कर अपनी
दांत निरंजन की गर्दन पर यूं रख दी। जैसे कोई शेरनी अपने शिकार पर दांत गड़ाती है।
और
इससे पहले कि कलावती निरंजन की गर्दन में अपनी दांत गड़ाती, निरंजन के हाथ में पता नहीं कहां से एक बड़ा सा सुआ प्रकट हुआ। और उसने वो
सुआ एक झटके से कलावती की पीठ में घोंप दी।
की.. की.. की… की… ।
कलावती
के गले से ऐसी चीख निकली, जैसे किसी ने चमगादड़ की गर्दन मरोड़ दी हो। निरंजन
की गर्दन पर से दांत हटा कर वो एक झटके से उससे अलग हुई। चेहरे के साथ उसका पूरा
जिस्म एक साथ एक सौ अस्सी डिग्री में घूमा। और एकाएक वो भागने के लिए बाहर की तरफ
झपटी। पहले से उससे ऐसी ही उम्मीद लगाए निरंजन उसके पीछे दौड़ा।
मगर
कलावती के भागने की स्पीड के सामने निरंजन की एक न चली।
आंगन में निकल कर कलावती रूपी चुड़ैल हवा में तकरीबन दस मीटर उपर उठी, और तेजी से उड़ती हुई गांव से बाहर बागीचे की तरफ भाग चली। पीछे निरंजन के हाथ में लगभग दो सौ मीटर लंबा एक मजबूत धागे का रोल बच गया, जो उस चुड़ैल की पीठ में गड़ी लंबी सुआ से जुड़ा हुआ था। 🌑🌑🌑
सुबह निरंजन और उसके मां-बाप तीनों उस धागे का छोर पकड़ कर गांव से बाहर मौजूद बागीचे की तरफ बढ़े। तकरीबन डेढ़ सौ मीटर दूर बागीचे में पहुंच कर आखिरकार एक महुआ के पेड़ के सामने वे रूके। वो एक बरसों पुराना और विशाल महुआ का पेड़ था। जिसके मुख्य तने में जमीन से लगभग पांच मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी कोटर थी। उनके हाथ में दबी हुई धागे का दूसरा सिरा उसी कोटर में घुसा हुआ था।
निरंजन आगे बढ़ कर पेंड़ पर चढ़ा।
कोटर के पास पहुंच कर उसने कोटर में घुसाने के लिए अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया।
“ठहरो ।”-देविका ने उसे सावधान
किया-“बिना देखे कोटर में हाथ डालना खतरनाक हो सकता है। उसमें जहरीले सांप भी घुस
कर बैठे हो सकते हैं। पहले देख लो कि अंदर कोई विषधर सर्प तो नही छुपा बैठा है।”
निरंजन ने एक आंख बंद करके दूसरी आंख
से कोटर के अंदर देखा। अंदर उसे सांप या कोई चिड़िया नही दिखा। संतुष्ट होकर उसने
अपना दाहिना हाथ कोटर के अंदर डाला।
दो सेकंड बाद जब उसका हाथ बाहर आया,
तो नीचे खड़े उसके पैरेंट्स ने देखा। और जो कुछ उन्होंने देखा, देख कर उनकी आंखें
आश्चर्य से फट पड़ी।
निरंजन के हाथ में एक छोटी सी हड्डी
दबी हुई थी। और जो सुआ उसने भागती हुई चुड़ैल की पीठ में घोंपा था, वही सुआ इस
वक्त उस हड्डी में धंसा हुआ था।
निरंजन आंखें फाड़े आश्चर्य से अपने
हाथ में दबी हुई हड्डी को देख रहा था।
★समाप्त ★
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विनित,
आनंद चौधरी
09-07-2026
