शर्मीला चांद
अपनी तारीफों को सुन देखो,
चांद आसमान का आज शरमा गया,
छुप गया बादलों की ओट में,
देख ये मन फिर भरमा गया,
बचपन से बुढ़ापे तक,
ये सफर इस शशि से है जुड़ा,
देख इसे पल भर,
हर कोई अपनी यादों में है मुड़ा,
चंदा मामा की कहानियों से ,
अपनी प्रियतमा की यादों तक,
देखा है कितनी बार इसे मैंने,
इसकी षोडश कलाओं तक,
शांति फैलता हरपल,
अपनी शीतलता से ये हिमकर,
इसकी सुंदरता में खोए कुछ,
चाहते न आए दिनकर,
चलो अब सब खोए हैं तो,
हम भी जरा सो जाएं,
देख इसे कहीं अपना ही,
मन न खो जाएं।
By:- अक्षत कोठियाल "पहाड़ी"
