पर्यावरण दिवस
पर्यावरण दिवस पर आलेख " प्रकृति से खिलवाड़ - विनाश
"स्वच्छ पर्यावरण का मानवजीवन पर प्रभाव और उससे प्रभावित हमारा जीवन"
किसी ने कहा है कि" यदि कोई कलाकार अपनी कृति और प्रगति को देखकर संतोष करले या अंहकार करने लगे, तो समझना चाहिये कि उसके विकास का अंत हो गया । प्रगति के शिखर पर पहुंचने के लिये उत्कट आकांक्षा और कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती है, प्रगति अनन्त है. इसलिये उसके प्रति सर्मपण भी असीम होना चाहिए ।"
उक्त पक्तियां हमारे पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन से प्रभावित मानव जीवन पर भी अपनी छाप छोड़तीं हैं । ईश्वर प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों के बिगड़ते रुप को सजाना संवारना, एवं स्वच्छ रखना मानव का कर्तव्य है, उसे वर्तमान रुप में स्वीकार कर संतोष नहीं करना चाहिये बल्कि उसके सुधार के लिये प्रयासरत रहना चाहिये ।
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का कारण हमारी क्षुद्र स्वार्थपरता और उद्घत अहंकार है। मानव ने जबसे स्वंय को नियंता मानकर प्रकृति का शोषण एवं दोहन करना प्रारम्भ किया तब से जलवायु परिवर्तन तेजी से बढ़ गया है। आज यह समस्या किसी एक देश की नहीं बल्कि इसकी सीमाओं में पूरी धरा और देश समाहित हैं। इसलिये यह एक वैश्विक चुनौती बन गई है, इसके समाधान के लिये सभी देशों को एकजुट होकर आगे आना पड़ेगा। चूंकि इस विनाशक परिवर्तन के कारण भी हम ही हैं, तो इससे निपटने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से विश्वभर में मौसम से संबधित कई तरह के परिवर्तन हुए हैं, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्रके जलस्तर में वृद्धि, गर्मी की तेज तपिश, पौधों और जानवरों की विविधताओं में बदलाव हमारे सामने आ रहे हैं । यूरोप जैसे ठंडे देशों में लू के थपेड़े बढ़ने लगे हैं इससे यूरोप का जनजीवन प्रभावित होने लगा है। बीसवीं शताब्दी से दैनिक तापमान में भी वृद्धि हुई है और रेगिस्तान में बर्फ गिरने जैसी आश्चर्य चकित घटनायें घटी, पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान वृद्धि जैसी घटनाएँ बढ़ी हैं।
आज विकास की दौड़ में नदी पर बांध बनाकर पानी रोका जा रहा है, पहाडों को काटकर रास्ता बन गये हैं, खेतों और जंगलो को काटकर गगनचुम्बी इमारतें, कल कारखाने से निकलता विषैला धुंआ, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की बहुतायत ने सांस लेना दूभर कर दिया है।
पर्यावरण को शुद्ध एवं संतुलित करने में जंगल एवं हरे भरे पेड़ पौधे अपनी अहम भूमिका निभाते है, लेकिन कुछ ही लोग होते है, जिनमें इन पेड़ पौधों के प्रति संवेदना होती है. और वे बच्चों की तरह उनका पालन पोषण करना चाहते हैं उन्हें खाद पानी देना पड़ता है, बीमारी में उनका इलाज करवाना पड़ता
है।
हमें प्रकृति हरियाली , जल, वायु उन्मुक्त रुप से प्रदान करती है, इनकी हमें कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती, इच्छानुसार उपयोग कर सकते हैं, लेकिन फैलते हुये प्रदूषण से ये इतने दूषित हो गये हैं कि अब लोग स्वच्छ जल, और वायु प्राप्त करने के लिये कोई भी कीमत देने को तैयार हो गये है ।
आज से पचास वर्ष पहले किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि पानी और आक्सीजन भी खरीदी जायेगी, परन्तु आज यह सत्य प्रतीत हो रहा है। जीवन को बचाने के लिये इन जीवनदायक प्राकृतिक संसाधन को खरीदने के लिये मजबूर हो रहे हैं। पर इसका स्थायी समाधान तो पर्यावरण को स्वच्छ रखना और प्रदूषण को नियंत्रित करना ही है, परन्तु लोग इसकी प्रायः उपेक्षा ही करते देखे जाते हैं, यह उपेक्षा भविष्य में ऐसे परिणाम भी ला सकती है कि जल शुद्धिकरण यंत्र के तरह वायु शुद्धिकरण के यंत्र भी लोग घरों में उपयोग करेंगे ।
होने को तो हर बात संभव है, पर इसकी जिम्मेदार हमारी वर्तमान निष्क्रियता ही ठहराई जायेगी ।
आज हमारे जीवन में पोलीथिन जो एक अभिन्न हिस्सा बन गई है, जिसका प्रदूषण को दूषित करने में
बड़ा योगदान है । पॉलीथिन का पुर्ननिर्माण एवं पुनः उपयोग इसको नष्ट करने की तुलना में ज्यादा सरल है। पॉलीथिन का उपयोग अधिकतम एक वर्ष तक किया जा सकता है पर इसे नष्ट होने में कई वर्ष लग जाते हैं। अतः इससे मुक्ति जरूरी है।कूड़ा कचरा अब केवल भूमि के लिये ही नहीं समुद्रों के लिये भी खतरा बनता जा रहा है, यह सोच ,कि सागर तो बहुत विशाल है इसमें कुछ भी डाल दिया जाये, पर्यावरण पर इसका कोई भी प्रभाव नही पड़ेगा, पर वास्तविकता इसके विपरीत है।
अत: स्वच्छ पर्यावरण के लिये स्वच्छ वातावरण बनाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है । स्वच्छ वातावरण स्वच्छ पर्यावरण के साथ स्वस्थ्य शरीर, स्वस्थ्य मस्तिष्क एवं स्वच्छ विचारों को पनपने में सहायक होता है, इसमें कोई दो राह नहीं है, तो आइये हम सब मिलकर इस प्रदूषण को दूर करने के लिये वृक्ष लगायें, जिससे कृत्रिम की जगह शुद्ध आक्सीजन मिल सके, और पोलीथिन यहां वहां न फेंकें जिससे जानवरों की जिदगी बच सके, और एक स्वस्थ्य प्रदूषण मुक्त वातावरण को बनाने में एक कदम स्वच्छता की ओर बढ़ाये , जिससे आने वाली पीढ़ी भी इस प्रदूषण से मुक्त रह सके और खुली हवा में सांस ले ।
हम लोगों ने ही धरती के सुरम्य वातावरण को बिगाड़ कर जलवायु में परिवर्तन के इस वीभत्स रूप को जन्मदिया है तो सभी को एक जुट होकर इस को सुधारने के लिये प्रयास करना चाहिये तभी परिवर्तन संभव है।
रीता खरे
मौलिक
