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मेरी रश्मि

बात उन दिनों की है जब मेरी नई - नई जॉब लगी थी। उस समय मेरी उम्र सिर्फ़ बीस साल थी। अब आप सोच रहे होगे की इतने कम उम्र में जॉब कैसे मिली तो मैं क्लीयर कर देता हूं कि मेरे पिता जी जो बैंक में अफसर थे उनकी कैंसर के कारण मौत होने से उनकी जगह बैंक में मुझे एसिस्टेंट की जॉब मिल गई । अब मेरे ऊपर परिवार की जिम्मेवारियां आ गई इसलिए मैने कॉलेज में एम ए की पढ़ाई छोड़ दी थी।मेरा नाम दीपक शर्मा है और घर में प्यार से मुझे दीप भी कहते हैं।वैसे मुझे भी दीप ही अच्छा लगता है। मेरा जन्म उन्नीस सो पचासी में हुआ तो उस समय लैंडलाइन से ही काम चलता था। दस साल बात मोबाइल आया तो वो भी पापा जी के पास। उनके जाने के बाद मेरे पास । अब जॉब कर रहा हूं तो आज भी पापा वाला वही सिम कार्ड जारी है और फोन बदल गया।साधारण फोन की जगह स्मार्ट फोन ने ले ली।बहुत कुछ बदल गया जिंदगी में लेकिन मेरी आदतें नही बदली।प्यार के लम्हों को मै हमेशा जी भर कर जिया हूं। प्यार तो प्यार है।रिश्ते दिल से निभाए जाते हैं लेकिन यदि चाहत हो तो रिश्ते बन जाते हैं और चाहत ही न हो तो अपने भी पराए हो जाते हैं। वो सामने हो, साथ में मीठी गर्म जलेबी खाई जाए।जब आखरी पीस पर लड़ाई हो जाए और फिर मेरा मन नहीं है तुम खा लो कहा जाए ,यही तो प्यार है।प्यार में मज़ा भी है और सजा भी। हां मैंने भी प्यार किया है।

मेरी बहन सुजाता की सहेली रश्मी भी उसी कॉलेज में पढ़ती थी जिसका आना जाना पिछले दस सालो से हमारे घर में था।वह इतनी खूबसूरत लगी कि मैं उसकी ओर अट्रैक्ट होने लगा। मैं उसे कई बार देखने के लिए अक्सर बाइक पर घूमता था या कोई समान लाने का बहाना बनाता था । मुझे रश्मी से एक तरह का लगाव हो गया था । मुझे लगता था कि रश्मि को इसकी भनक नही होगी लेकिन ये मेरा भ्रम था।

एक दिन कॉलेज में रश्मि की तबियत खराब होने के कारण सुजाता ने मुझे कहा कि भाई रश्मि को घर छोड़ आओ। इतना सुनते ही ऐसे लगा कि आज तो मेरे मन की मुराद भगवान ने पूरी कर दी । मेरे मन मे लड्डू फ़ूटने लगे । मैने चेहरे पर गंभीर भाव लिए और बाइक की तरफ चल दिया । रश्मी और सुजाता मेरे पीछे चल पड़ी ।मैने सुजाता से पूछा कि इसे डॉक्टर के पास लेकर जाऊं तो उसने मना कर दिया।यही कहा कि बस घर ही छोड़ देना। मैने बाइक स्टार्ट की। रश्मि मेरे पीछे बैठ गई। रास्ते में मै खुद को हीरो समझ रहा था और उसे अपनी डार्लिंग। मैंने अपनी आंखों पर लगे गॉगल्स को ऊपर उठाकर सर पर किया और बाइक की स्पीड बढ़ा दी।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मै उससे क्या बात करूं,सोच रहा था कि ये ही मुझे बाइक की स्पीड कम करने को कहेगी लेकिन मेरा प्लान फैल हो गया और घर अब थोड़ी ही दूर रह गया।
बेवकूफी थी मेरी जो इतनी जल्दी इसे यहां ले आया ,यदि धीरे चलता तो काफी समय इसके साथ गुजारता।मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था इसलिए मैने बाइक स्लो कर ली।
खैर उसका घर आ ही गया और मैंने उसकी मां को उसकी तबियत के बारे में बताया ।उन्होंने मेरा शुक्रिया किया और मै वापिस कॉलेज आ गया।
मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगा और मैं बस रश्मि के बारे में ही सोचता रहा।मैने स्टाइल तो अच्छा मारा था लेकिन दिमाग से काम नहीं लिया।यदि दिमाग का यूज करता तो उसे प्रपोज करके अपने मन की बात कह देता लेकिन जो होना था वो तो हो ही चुका । कॉलेज के बाद सुजाता को घर छोड़ मै बाहर अपने दोस्तों के साथ चला गया ताकि मूड थोड़ा ठीक हो।रात को सात बजे जब घर आया तो घरवालों को बता दिया कि बाहर ही खाना खा लिया है और मै अपने कमरे में चला गया।हमारे घर में सब खाना आठ बजे से पहले ही खा लेते हैं,जल्दी सो जाते हैं ताकि सुबह जल्दी उठ सकें।

मेरा न तो पढ़ने का मन हुआ और न ही मुझे नींद आ रही थी। मै बिस्तर पर लेट गया।मन बहुत दुखी हुआ कि जिस लड़की को इतने समय से चाहता हूं,इतना प्यार करता हूं , एक बार भी उससे अकेले बात नहीं की थी।आज ही भगवान ने मुझे मौका दिया और मैंने उसे गंवा दिया। मैने तो यही सोचा था कि कभी मौका मिलेगा तब उसे कहूंगा ।अपने दोस्तों को , यहां तक कि मैंने अपनी बहन को भी ये नहीं बताया।आज दिल चाह रहा था कि काश उसे डेट पर ले जाऊं और बातों ही बातों में उसकी पसंद या नापसंद पूछूं क्योंकि मै ये भी नहीं चाहता था कि जबरदस्ती उसे अपनाऊं या सरफिरे लडकों की तरह उसका जीना हराम कर दूं।ऐसे तो मेरे घर रोज आती थी वो इसलिए यदि चाहता तो उसे मैं उसे अपने घर में भी कोई मौका देखकर आई लव यू बोल सकता था लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि मैं उसकी दिल से रिस्पेक्ट करता हूं ,करता था और करता रहूंगा ।रश्मि के बारे में सोचते - सोचते रात के दस बज गए और नींद मेरी आंखों से कोसों दूर थी । मैंने सोचा थोड़ा सा पढ़ लूं ताकि मुझे नींद आ जाए इसलिए मैंने कॉलेज वाले नोट्स उठाएं और पढ़ने लगा । जैसे ही दो पेज पढ़ें और तीसरा पेज उल्टा तो एक कागज दिखाई दिया जो मुड़ा हुआ था । मैंने उसे खोला और पढ़ने लगा । उसमें क्या लिखा था यह मैं अभी नहीं जानता था लेकिन उसे हाथ में लेते ही मेरे दिल की धड़कने बढ़ने लगी । कागज के दोनों ओर लिखा हुआ था।हिम्मत करके मैंने उसे खोला और पढ़ने लगा। 

दीपक जी मै रश्मि आज जानकर आपके रूम में आई ताकि अपनी बात कह सकूं।
आपको लगा कि मैं पागल हूं लेकिन मैं सब जानती हूं।मुझे पता है कि आप मुझे छिपकर देखते हैं,मुझसे अकेले में मिलने के बहाने ढूंढते हैं।आज आपके साथ घर तक आ तो गई लेकिन नहीं मालूम था कि आप मुझे बाइक तेजी से चलाकर दिखाएंगे,आपने ऐसे क्यों किया?फिर जब घर पास आ गया तो स्पीड कम कर ली।कभी चश्मा लगा रहे थे कभी उतार रहे थे।मम्मी के सामने जो ओवर एक्टिंग की उसके बारे में तो मै क्या लिखूं क्योंकि मेरे पास शब्द ही नहीं हैं। आपके घर में जब सुजाता के साथ होती हूं तो आप का चेहरा भले कहीं हो लेकिन कान खड़े रहते हैं, मै जो बोलती हूं इतना ध्यान उस पर देने की बजाय यदि किताबों में दोगे तो कॉलेज टॉप कर जाओगे। टॉपर बनकर अच्छी फीलिंग आयेगी,घर वाले ,कॉलेज वाले सब खुश और ये आपको कैरियर में भी स्पॉट करेगा लेकिन नहीं आपको तो कुछ और ही करना है।मेरे ट्यूशन जाने के समय जानकर उसी रास्ते से अपना फुकरापन दिखाना है,मुझे पटाना चाहते हैं आप दीपक जी।

इतना पढ़ते ही दूसरा पेज पलटता मम्मी कमरे में आ गई।
"दीप खाना तो बाहर खाकर आया था लेकिन दूध पीना भी भूल गया। तेरी तबियत तो ठीक हैं।चेहरा उतरा हुआ है।" 
मैने कहा, " मै बिल्कुल ठीक हूं मां,नींद आ रही थी लेकिन थोड़े नॉट्स बनाने थे इसलिए आपको ऐसे लग रहा हैं।"
"ठीक है ,जल्दी ही सो जाना " , मां ने कहा और दूध टेबल पर रख दिया। मां चली गई।
मै अंदर से दुखी हो गया, मै रश्मि की नजरों में बहुत ज्यादा गिर गया था ऐसे सोचते हुए मेरी आंखों से आंसू बहने लगे।मैने सोच लिया था कि कल मै उसे लिखकर सॉरी दूंगा। क्या सोचा था और क्या हो गया।बचपन का प्यार गलतफहमी का शिकार हो गया।सारे ख्वाब टूट गए, खुद को दुनिया का सबसे दुखी आदमी सोचने लगा हिम्मत करके मैंने कागज का अगला पेज पढ़ने के लिए पलटा।

आप मुझसे आई लव यू कहना चाहते हैं। मै जानती हूं।आज आपके पीछे बैठी तो आपको बहुत अच्छा लगा।दस साल तक एक ही लड़की पर टिके रहना कोई आसान बात नहीं।वैसे भी आप का दिमाग खराब है बहुत टाइम वेस्ट किया आपने मेरे लिए । बस अब और मत करो।कृपा करके कल ट्यूशन से आते हुए मेरे आगे पीछे मत फिरना।सीधा बाइक रोक देना और मै आपकी बाइक पर बैठ जाऊंगी।मुझे गोलगप्पे खिलाना।याद रखना कि आई लव यू पहले आपको ही बोलना है और प्रपोज भी आप ही करोगे वरना मै आपके सपनों में भूतनी बनकर आऊंगी और पढ़ने नहीं दूंगी।
रश्मि।
ये पढ़के तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।जाने कितनी बार उस खत पर हाथ फेरा। कितनी बार उसे चूमा। मजा आ गया।दूध ठंडा हो गया था मै ऐसे ही पी गया और कमरे की लाइट बंद करके लेट गया।उसकी तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद भला मुझे नींद कैसे आ सकती थी। उसके साथ समय बिताने के ख्वाब देखने लगा। सुबह कपड़े कौन से डालने हैं,रश्मि से आंखे कैसे मिलाऊंगा,जाने हसीन सपने देखते हुए रात बढ़िया कटी।
अगले दिन कॉलेज में उसे देखा लेकिन कोई ओवर एक्टिंग नहीं की।शाम को हम मिले और बातें हुई। मैने प्रपोज किया और वो खुश हो गई। फिर तो हम अक्सर छिप छिपकर थोड़ा बहुत मिलने लगे।
कुछ दिनों बाद पापा बीमार हुए ,जब उनकी डेथ के बाद मैने जॉब करनी शुरू की लेकिन साथ ही मां की तबियत बिगड़ने लगी। रश्मि और उसके परिवार वालों ने भी मां को संभाला।रश्मि भी सुजाता की केयर करती। बस अब मै रश्मि से मिलता नहीं था।रश्मि हमारे घर जब आती उस समय मै ड्यूटी पर होता था।
इस तरह एक साल हो गया।मां अब घर में बस एक बात की रट लगाए रहती कि कोई अच्छी सी लड़की मिल जाए तो बहू बनाकर ले आऊं और साथ ही सुजाता के हाथ पीले कर दूं।
उनकी बातों से सुजाता तो गुस्से में दो चार सुना भी देती लेकिन मै उनकी भावनाओं को समझ गया था।सुजाता से पता चला कि आजकल रश्मि का हमारे घर में आना जाना कम हो गया था।ड्यूटी से फ्री होकर थोड़ा बहुत ही रश्मि को देख पाता था।मैने एक दिन रश्मि से कहा कि अब तो मेरी जॉब लग गई है , मां को भी बहू चाहिए । मै तुमसे शादी करना चाहता हूं।बोलो मै कब तुम्हारे घर में बात करूं।मेरे घर में तो मै तुम्हारे लिए सबको मना लूंगा। मेरी बात सुनके रश्मि ने कहा कि उसे शादी नहीं करनी है।प्लीज आगे से कभी मुझसे शादी की बात मत करना।
मेरा दिल ये मानने को तैयार नहीं था कि रश्मि मुझे ऐसे कह सकती है।वो जब मुझसे प्यार करती है तो शादी करनी क्या हर्ज है। मै कमाता भी हूं।वो सुजाता की दोस्त भी है, दोनों परिवार आपस में एक दूसरे को अच्छे से जानते भी हैं।मैने घर जाकर सोचा कि शायद रश्मि मजाक कर रही है।पहले भी तो उसका खत पढ़कर मै डर गया था ,असली मजे की बात उसने लास्ट में लिखी थी।शायद ये मुझे कोई सरप्राईज देना चाहती हो।फिर मैने ये भी सोचा कि शायद वो अपने घर में सबसे छोटी है तो क्या पता शादी के लिए शर्म कर रही हो।उसके मन में क्या है मै ये समझ नहीं पा रहा था।
काफी सोच विचार कर मैने निर्णय लिया कि पहले मै घर में मां और सुजाता को बता दूं।
अगली सुबह जब मैंने मां और सुजाता के सामने नाश्ते के समय अपनी बात रखी तो मां ने गुस्से से कहा,"वो रश्मि हमारे घर की बहू कभी नहीं बन सकती।"
मां कहकर रसोई में चली गई।सुजाता हैरान हो कर मुझे देख रही थी।
मैने सुजाता से कहा," भला तुम्हारी सहेली जब आती है इतने प्यार से बोलते हैं तुम सब और आज तुम चुप क्यों हो?
उसने बस इतना ही कहा कि रश्मि मेरी भाभी बनने के लायक नहीं है।प्लीज भैया उसे भूल जाइए।ऐसा कहकर सुजाता वहां से चली गई। मै ऑफिस में था।मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्योंकि पहले तो रश्मि ने ,फिर मां ने और फिर सुजाता ने भी मेरे और रश्मि के रिश्ते को एसेप्ट नहीं किया।
एक हफ्ते बाद रश्मि मेरे ऑफिस आई और उसने मुझे बताया कि वो कभी मां नहीं बन सकती इसलिए वो किसी से भी शादी नहीं करेगी।तुम किसी और से शादी करो ।अपने लिए न सही लेकिन आंटी जी और सुजाता के लिए मना मत करना।थोड़ी बहुत बातें करके वो चली गई। वह रोई नहीं लेकिन रोने से बढ़कर लग रही थी। मै भी बहुत दुखी हुआ।समाज की सोच भी अजीब है।बच्चा तो गोद भी लिया जा सकता है लेकिन भला प्यार कहां मिलता है। मै नहीं चाहता था कि मां से दोबारा रश्मि के बारे मे बात करूं।
मै गुमसुम रहता। वक्त के साथ मैने चुप्पी की चादर ओढ़ ली।रश्मि के पापा की ट्रांसफर दूसरे शहर हो गई और वें यहां से चले गए। मै आखिरी बार रश्मि से मिलना चाहता था लेकिन शायद भगवान को ये मंजूर नहीं था। बाद में पता चला कि रश्मि किसी अनाथालय में सेवा करने लगी।
समय के साथ ही मां ने मेरी शादी प्रोमिला नाम की लड़की से और सुजाता की राज नाम के लड़के से करवा दी।मैने उसे रश्मि के बारे में सब बता दिया लेकिन उसे गुस्सा नहीं आया।प्रोमिला बहुत सुलझी हुई थी फिर भी मैं उसे रश्मि जितना प्यार नहीं दे सका। उसने कभी कोई शिकायत भी नहीं की।
वक्त बीतता गया।रश्मि की यादें धुंधली होती गई जिस पर प्रोमिला हावी होने लगी। मां भी ठीक रहने लगी।
प्रोमिला ने एक साथ दो बच्चों को जन्म दिया। एक लड़का और एक लड़की पाकर मैं धन्य हो गया लेकिन अफसोस प्रोमिला हमारे बीच नहीं रही।
बच्चे छोटे होने के कारण मां ने मेरी दूसरी शादी करने का फैसला किया।
मैने मां के सामने मैने रश्मि से शादी करने का प्रस्ताव रखा। मां ने मना किया लेकिन मैंने समझाया कि रश्मि बच्चे नहीं दे सकती थीं लेकिन वह पाल तो सकती है।मैने काफी जिद की।अनाथालय जाकर रश्मि से फिर उसके घरवालों से बात की।बड़ी मुश्किल से रश्मी से शादी हो पाई।आज वही रश्मि सबका ख्याल रखती है। मां,सुजाता और रश्मि के घरवाले सब खुश हैं। बच्चों को कभी अहसास नही हुआ कि रश्मि उनकी मां नही और हमने ये सब उन्हें बताना भी जरूरी नहीं समझा।
अब रश्मि कभी पहले की तरह शैतानियां करती है,तो कभी मुझे भाषण देती है।कभी अतीत को याद करके मेरे कन्धे पर सर रख कर रो लेती है,कभी बच्चों के साथ मस्ती करती है,कभी मां के साथ डांस करती है और मंदिर जाती है।
बच्चे बड़े हो रहे हैं लेकिन वही रोमांस,वही प्यार,वही एक दूसरे को छिपकर देखने की ललक आज भी है।आज भी रश्मि पहले की तरह ही शर्माती है।

"मेरा प्यारा सा जहां
मेरे बच्चे मेरी मां
मेरी चाहत मेरी वफ़ा
रश्मि मेरी जान "

कभी कभी सोचता हूं कि मेरा प्यार सच्चा है जो मुझे मिला है,प्रोमिला को भूल नहीं पाऊंगा क्योंकि उसी के कारण ही तो घर के आंगन में दो फूल खिले हैं।

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