"मैं राष्ट्रभक्त हूं और आजीवन राष्ट्र की सेवा करता रहूंगा !" ---किरण कुमार पाण्डेय
Book Summary
गुरुजी मुस्कराए और बोले, "आनंद बड़ी विलक्षण 'अनुभूति' है ! कहीं यह तन और धन तो कहीं भक्ति और वैराग्य में और तो और कहीं यह अकर्मण्यता, अज्ञानता और उच्छृंखलता में भी आ जाता है ! ऐसे में आनंद को दोष देना ठीक नहीं !" मेरी समझ में आ गया था कि, आनंद क्या है और मैं समझता हूं कि वहां मौजूद सभी लोगों की समझ में आ गया था कि आनंद क्या है ! मेरी श्रीमती जी अपलक मुझे ही देखे जा रही थीं, मानो कह रही हों कि, "मेरे माता-पिता ने ऐसे थोड़े ही राह चलते किसी लड़के के साथ मुझे बांध दिया, काफी खोजबीन हुईं, तब जाकर तुम्हें मेरे घर की चौखट 'लांघना' नसीब हुआ !" मैं मन ही मन आनंदित हुए जा रहा था !