Reeta Khare - (03 October 2026)अद्भुत वृतान्तों से भरी जिंदगी जीने वाले कर्मयोगी को शत शत नमन🙏💐 बहुत सुन्दर सटीक लेख आदरणीय आपको सादर प्रणाम🙏
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Kapil Dev Agrawal - (03 October 2026)बहुत ह्रदयपर्शी लेख । लेकिन क्या आज के जीवन के लिए तर्कसंगत है । आज के नेता ऐसे लोगों के सीने पर पैर रख कर चलने में भी संकोच नहीं करेंगे । भीष्म ने अंतिम समय कृष्ण से पूछा कि त्रेता युग में तुम मर्यादा पुरुषोत्तम थे , द्वापर में उन मर्यादाओं का क्या हुआ । कृष्ण ने कहा - हे महामना , त्रेता युग में मेरा सामना किससे था? महा ज्ञानी, महा तपस्वी , महा गुणी था रावण । राक्षस था पर दश्त नहीं था । द्वापर में ये सारे दुष्टों से निपटने के लिए वे मर्यादाएं , वे नैतिक मूल्य काम नहीं आते। इसलिए तो मुझे ये चल करने पड़े और यही उचित था । शायद यही दृष्टांत आज के कलियुग में भी उतना ही सारगाम्य है कि दुष्टों को दंड ही मिलना चाहिए चाहे जिस विधि से हो । आपके इस उत्साहवर्धक लेख के लिए बहुत शुभकामनाएं ।धन्यवाद।