"मैं राष्ट्रभक्त हूं और आजीवन राष्ट्र की सेवा करता रहूंगा !" ---किरण कुमार पाण्डेय
Book Summary
अनेकों ऋषि, मुनियों, तपस्वियों ने समय-समय पर इस पतित पावन धरा धाम पर आकर हमारा मार्गदर्शन किया जिससे हम लोग सुचारू रूप से अपना जीवन निर्वहन करते रहे ! कालांतर में इंसान के भीतर मैं रुपी राक्षस ने जन्म लेना शुरू किया परिणामस्वरूप न सिर्फ उस व्यक्ति का अहित हुआ अपितु सम्पूर्ण मानव सभ्यता को उस व्यक्ति के भीतर पनपने वाले 'मैं' (अर्थात अहंकार) के कारण कष्ट भोगना पड़ा ! अनेकों लोग इस धरा पर आए और चले गए जिनके भीतर रहने वाले 'मैं' ने उनसे ऐसे -२ कृत्य करवाए जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती ! रावण, कंस, नरकासुर, हिरण्यकशिपु इत्यादि के जीवन-काल को उठाकर हम देख सकते हैं ! अब प्रश्न उठता है कि, "क्या यह 'मैं' स्वयं तक सीमित है अथवा इसके तार 'अहंकार' से भी जुड़े हुए हैं ?" आइए थोड़ी विवेचना हो जाए...