इस आलेख में मैं अपने जीवन की एक ऐसी वास्तविक उलझन के बारे में लिख रहा हूं जिसने अकारण मेरे मित्रों के बीच मुझे कई बार रहस्यमय बनाया और मुझे उनसे बेबात के दूर भी कर दिया। शायद यही कारण है कि मैं हमेशा शरीर को एक अजूबे की तरह देखता रहा और अपने लेखन में इससे हमेशा डरा -घबराया रहा। सच में, आत्मा - परमात्मा हमारे लिए पीछे हैं, पहले है हमारा अपना जिस्म। जब ये नहीं रहता, तो आत्मा- परमात्मा भी हमारे लिए ओझल हो जाते हैं।