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चक्रधारी

चक्रधारी


Sanjay Kaushik Sanjay Kaushik

Summary

कृष्ण की भक्ति व प्रेम में आकण्ठ डूब जाने से पूर्व स्वयंबोध एवं निर्मलीकरण नितांत आवश्यक है, अन्यथा स्थूल से परे न देख पाएँगे । इसी...More
Poem Self-help
Kiran Kumar Pandey - (18 December 2024) 5
श्री कृष्ण भक्ति से ओत-प्रोत आपकी यह रचना सराहनीय है ! मेरा एक सुझाव है कि एक बार फिर से इसको लयबद्ध किया जाए तो रही सही कसर भी दूर हो जाएगी ! उदाहरण के तौर पर एक लाइन में दो बार "हूं" का आना, धेनु की क्षुधा शांत कर के - यहां 'के' की आवश्यकता नहीं, जा के यमुना में घुल जाता - यमुना के जल में मिल जाता, ग्वालों द्वारा माखन चोरी को हुड़दंगों की टोली बनाकर दर्शाने को भी एक दूसरे नजरिए से लिखने की आवश्यकता है ! कविता के दो भाग हैं जिन्हें एक बार फिर से कलमबद्ध करने की आवश्यकता है ! प्रथम भाग में इच्छा शक्ति तो दूसरे भाग में समर्पण और मुक्ति की भावना साफ़ झलकती है ! आशा है आप मेरे सुझाव पर गौर करेंगे, कलम पर नहीं ! धन्यवाद !

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Sunita Sharma - (31 August 2024) 5
Bhakti bhav dekhti he.aur aapki kavita me ye sahaj bhav se vykt ki gai h.bahut khubsurat.

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Sanjay Sharma - (31 August 2024) 5
कविता का भाव बड़ा ही निश्चल और निर्मल है कवि के हृदय के जैसा!

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Pradeep Shukla - (30 August 2024) 5
आपके शब्दों में ज़िन्दगी की सच्चाइयाँ और जज़्बात का संगम है, बेहतरीन रचना✍👏

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Dev Shakya - (30 August 2024) 5
बहुत अदभुत रचना है|

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Dinesh Mishra - (29 August 2024) 5
कविता एक भक्त की आत्मस्वीकृति और कृष्ण से क्षमा की प्रार्थना को व्यक्त करती है। भक्त अपने दोषों और कमजोरियों को स्वीकारते हुए, भगवान से सुदर्शन चक्र द्वारा अपने पापों का नाश करने की याचना करता है। कविता भावपूर्ण और भक्तिमय है। संजय भाई को बहुत बहुत साधुवाद ।

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ऋजुता देशमुख - (27 August 2024) 5
बहुत सुंदर प्रस्तुती

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Freelance Professional Writer

Publish Date : 26 Aug 2024

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