"मैं पुकार हुँ अनंत की,पतझड़के ह्रदय में सोए वसन्त की"
Book Summary
इस कविता में एक माँ की गहरी पीड़ा झलकती है, जिसे यह जानकर दुख होता है कि उसका अपना बच्चा अपने दिल की बातें दोस्तों से बाँट देता है, लेकिन अपनी माँ से नहीं। वह सोचती है कि क्या उसकी ममता या परवरिश में कोई कमी रह गई, जो बच्चा उससे दूर और दोस्तों के इतना करीब हो गया। माँ को डर है कि शायद वह उसके दिल के घर की चाबी खो चुकी है, लेकिन फिर भी उसके भीतर एक उम्मीद ज़िंदा है—कि एक दिन बच्चा खुद आकर उसे अपना सच बताएगा, और उसकी लंबी प्रतीक्षा समाप्त होगी।