Saurav Prakash - (05 January 2026)बहुत ही भावपूर्ण और सजीव पंक्तियाँ हैं।
कवि मयूरा ने माँ-बाबा के रिश्ते को केवल रक्त का नहीं, बल्कि संस्कारों की विरासत के रूप में उकेरा है।
संस्कार हमारे भीतर ज़िंदा होते हैं - माता-पिता शरीर से नहीं, बल्कि हमारे विचारों, आचरण और मूल्यों में निरंतर उपस्थित रहते हैं।
कम शब्दों में गहरी बात कहना, भावनाओं को कोमल रंगों से सजाना और पाठक के मन को छू जाना—यह मयूरा की लेखनी की खूबसूरती है।
सौरभ 🍁
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Ravinder Ahluwalia - (26 December 2025)dil ko chhu gayi sari poems are beautifully expressed,first one baba yaad aaye ma sach ma akke bar aayi
Anupriya Bhand - (26 December 2025)बहुत सुंदर, आंखे भीग रही है
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किरण कुमार पाण्डेय के के - (25 December 2025)अति सुन्दर 💐💐🙏🙏 इतने सारे विचार एक साथ देखकर ऐसा लगता है जैसे विचारों की खेती हो रही है ! आपने बड़ी मेहनत की है ! सबसे अच्छी बात लेख आपके जीवन से जुड़ा भी है अन्यथा इतना सटीक लिख पाना सम्भव नहीं ! बेहतर प्रयास ... शुभमस्तु🙏🙏💐💐
नमस्कार,
ईश्वर की असीम कृपा और आपके प्यार से प्रेरित हो प्रस्तुत कर रही कुछ और रचनाएं. मुझे उम्मीद है इन्हें पढ़कर आप अवश्य अपनी प्रतिक्रिया देंगे.
आपके विचार और आशिर्वाद की अभिलाषा में ….🙏
मयूरा करमलकर काशीकर