"मैं पुकार हुँ अनंत की,पतझड़के ह्रदय में सोए वसन्त की"
Book Summary
यह कविता बताती है कि जैसे एक छोटे से बीज में एक विशाल वृक्ष का पूरा अस्तित्व छुपा होता है, वैसे ही हर मन में अदृश्य, अलौकिक और अपार शक्ति छिपी रहती है। यह शक्ति तभी जागती है जब हम भीतर की ओर ध्यान दें, स्वयं को पहचानें और अपने विश्वास की धूप में खिलने दें। कविता आत्म-जागरूकता, अंतर्मंथन और भीतर बसे ब्रह्माण्ड को पहचानने की प्रेरणा देती है।