किरण कुमार पाण्डेय के के - (10 April 2026)बदलते परिवेश में बहुत कुछ बदल गया है ! चंद शब्दों में "बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है.. अंजाम गुलिस्तां क्या होगा हर शाख पर उल्लू बैठे हैं ..
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ललित मोहन पाण्डे - (10 April 2026)आप दोहों के विशेषज्ञ जान पड़ते हैं
यह कविता आक के बदलते परिवेश को लेकर है। आशा करता हूँ आपको यह रचना आप सभी को पसंद आएगी। आप यह कविता पढ़ कर अपनी अनमोल प्रतिक्रिया प्रदान कर मुझे अनुग्रहीत करें। धन्यवाद।