कुमार धनंजय सुमन - (12 April 2026)उम्दा लेखन ,पढ कर आनंद आ गया ।शुभकामनाएँ खानाबदोश ज़िंदगी ठिकानों से नहीं, रास्तों से अपनी पहचान बनाती है। यह हर मोड़ पर बिछुड़ने का दुःख और आगे बढ़ने का साहस साथ रखती है। इसके पास कम सामान होता है, पर अनुभवों का आकाश भरा रहता है। यही भटकन अंततः मनुष्य को दुनिया नहीं, स्वयं से मिलाती है।
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किरण कुमार पाण्डेय के के - (11 April 2026)आधुनिक भारत में लगभग चालीस प्रतिशत लोग रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों अथवा प्रदेशों की शरण लेते हैं ! ऐसे में जो लोग परिवार सहित रहने जाते हैं उनका जीवन खानाबदोश जैसा ही है !
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जीवन रोज बदल रहा है , बढ़ रहा है. कभी दाना पानी के लिए, कभी स्वप्न पूर्ति के लिए इंसान एक शहर से दूसरे शहर, प्रदेश, देश घूमता रहता है...एक खानाबदोश सा.
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