"मैं पुकार हुँ अनंत की,पतझड़के ह्रदय में सोए वसन्त की"
Book Summary
मृत्यु हमें जीवन के सबसे गहरे प्रश्नों से रूबरू कराती है। जब कोई अपना इस संसार से चला जाता है, तब मन पूछता है कि हमारा प्रेम वास्तव में शरीर से था या उस चेतना (आत्मा) से जो उसमें निवास करती थी। शरीर तो वही रहता है, पर आत्मा के जाने के बाद वह अपना नहीं लगता। इससे समझ आता है कि हमारा प्रेम उस दिव्य चेतना से होता है जो शरीर के माध्यम से प्रकट होती है।