किरण कुमार पाण्डेय के के - (27 June 2026)जिंदगी की हकीकत से रूबरू कराती यह रचना वाकई काबिले तारीफ़ है ! यह कविता पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या आज हम जहां है, सही जगह पर हैं अथवा स्वयं को तसल्ली करने के लिए कुछ भी कहते रहते हैं ! वाकई यह एक दर्द तो है ही कि हम बढ़ तो आगे रहे हैं लेकिन चल पीछे रहे हैं कुछ कुछ घड़ी की सुइयों की तरह जो बढ़ती तो आगे है लेकिन हमारी जिंदगी के पल कम करती रहती है ! सराहनीय, विचारणीय एवं शिक्षाप्रद काव्य कृति ✍️🙏💐✅✨