कहते हैं आप कि यहां मैं अपने बारे में कुछ लिखूं, क्या लिखूं, लिख दूं यहां अपनी कुछ बचपन की नादानियां, या कि कुछ अपने जवां दिल की बदमाशियां लिखूं, या गुजिश्ता कुल जिंदगी पे कोई अफसाना हसीं लिखूं, यूं तो जिंदगी में सोज़े ग़म के तराने भी कुछ कम नहीं, बहरहाल समझ नहीं आता मुझे कि अपने बारे में मैं...More
कहते हैं आप कि यहां मैं अपने बारे में कुछ लिखूं, क्या लिखूं, लिख दूं यहां अपनी कुछ बचपन की नादानियां, या कि कुछ अपने जवां दिल की बदमाशियां लिखूं, या गुजिश्ता कुल जिंदगी पे कोई अफसाना हसीं लिखूं, यूं तो जिंदगी में सोज़े ग़म के तराने भी कुछ कम नहीं, बहरहाल समझ नहीं आता मुझे कि अपने बारे में मैं खुद ही क्या लिखूं..
-अतुल।
Book Summary
यहां स्त्री और पुरुष के संबंध को डिफाइन करने से ज्यादा, उस भ्रम को पकड़ना मुझे ज्यादा रोचक लगा जिसमें दोनों स्वयं को स्वतंत्र कर्ता समझते हैं, जबकि प्रकृति उनसे अपना नाटक करवाती रहती है। मेरी इस कविता का स्वर न तो स्त्री-विरोधी है, और न ही पुरुष-विरोधी। बल्कि थोड़ा दार्शनिक, आत्मदर्शी और अंत में चौंकाने वाला हो गया है। जैसे, हम प्रेम को अपना निर्णय समझ लेते हैं, आकर्षण को अपनी इच्छा, संतान को अपना विस्तार, और फिर जीवन भर इन्हीं को अपना सत्य मानते रहते हैं।
इन्हीं संभावनाओं के बीच इस दिशा में कविता कुछ ऐसी बन पड़ी है, आपके लिए..
अतुल।