पुस्तकें जो मित्र थीं

पुस्तकें जो मित्र थीं


ललित मोहन पाण्डेय ललित मोहन पाण्डेय
Poem
Alka Puntambekar - (07 August 2026) 5
आज के परिवेश को आईना दिखती कविता।

0 1

Maya Mahajan - (07 August 2026) 5
सच्चाई का बोध कराती कविता, सच्चाई जो मालूम तो है, लेकिन आधुनिकता के धुंद मे खो गई लगती है.

0 1

किरण कुमार पाण्डेय के के - (06 August 2026) 5
बेहद सुंदर एवं संवेदनशील कविता 🙏🙏💐💐✍️✍️ बताते चलें कि, वर्ष १९९९ में 'इंटरनेट' के बारे में मुझे एक 'संक्षिप्त' टिप्पणी देनी थी ! उस समय सभी जानकारियां पुस्तकों के माध्यम से ही मिलती थीं तब मुझे इंटरनेट का अर्थ 'जाल' के रुप में हुआ था और आज भी यह 'एक भ्रम रुपी जाल' साबित हो रहा है जब शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों 'दृश्य भाष्य यंत्रों' की मदद से 'ज्ञान का आदान-प्रदान' कर रहें हैं ! यह कैसे सम्भव है कि, जब एक ही दुकान पर मदिरा और मधु बिक रहे हैं तब खरीदने वाला भ्रमित नहीं होगा ? बीते दिनों 'निम्न' कोटि के शिक्षार्थियों की 'निम्नतम' आचरण से सम्पूर्ण राष्ट्र 'हतप्रभ' है ! धन्यवाद सर जी 🙏🙏💐💐

1 1

Devesh Dixit - (06 August 2026) 5
जबरदस्त रचना आपकी ललित जी 😊👍👌💐🎉🎊❤️

0 1


ललित मोहन पाण्डेय

Publish Date : 06 Aug 2026

Reading Time :


Free


Reviews : 4

People read : 12

Added to wish list : 0