*हौसलों की उड़ान* सिर्फ एक कविता नहीं, एक सोच है। जब मन में ठान लिया कि उड़ना है, तो आसमान को भी झुकना पड़ता है। पंख भले छोटे हों, लेकिन हौसले अगर बड़े हों तो कोई तूफान रोक नहीं सकता। ये कविता उस पिंजरे के बारे में है जो बाहर नहीं, हमारे मन में होता है। और जिस दिन हम वो पिंजरा तोड़ कर पंख फैला देते हैं, उसी दिन हम अंबर को नाप लेते हैं। रात कितनी भी काली हो, भोर उतनी ही प्यारी होती है। गिरना, संभलना, तिनका-तिनका जोड़ कर अपना घर बनाना - यही तो सफर है। जो वक्त की आँधियों से डर गए, वो उड़ने से पहले ही मर गए। लेकिन जिसे सूरज की तरह चमकना है, उसे न रुकना है, न थकना है।