Gaurav Kumar - (10 January 2025)हास्य का अभाव रहा... जो था वो हँसाने को नाकाफी.... मॉडर्न के नाम पर कहानी मे कुछ नहीं
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भरत (राज) - (15 August 2024)भूतनी पान भी खाती है ।वाह सर बहुत अच्छा लिखा ।
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Sanjay Kaushik - (21 July 2024)उत्तम पृष्ठभूमि चयन जिसमें हास्य की प्रचुर सम्भावना थी । कथानक के विभिन्न प्रसंग इस सम्भावना का और अधिक दोहन कर सकते थे । अंग्रेज़ी शब्दों के अत्यधिक उपयोग से बचा जा सकता था । रही सही कसर उर्दू के घालमेल ने कर दी, क्योंकि वह तो पृष्ठभूमि का भार वहन करने के लिए आवश्यक हो चली थी । शब्दों की त्रुटियों से दूरी उचित रहती।