Prem Sharma - (20 February 2021)बर्फ सा पिघलता लेख जो सुकून दे जाता है और साथ में हिमालय की याद भी ताज़ा कर जाता
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रश्मि पाठक - (19 November 2020)भारती जी के लेखन पर टिप्पणी करने की सामर्थ्य नहीं है. उनका लिखा बहुत पढ़ा है. सहज प्रवाह से लिखा यह वृतांत अपूर्व है.
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Kalpana Manorama - (06 June 2020)ठेले पर हिमाल बेजोड़ अपनी ओर खींचने वाला शीर्षक उस पर रचनाकार का लोरी नुमा कहन।पढ़ते हुए मन कभी पिता के कोमल मन की कल्पना करने लगा कभी माँ का दूधिया स्नेह महसूसने लगा । जहाँ लेखक रुका होगा कहते हुए वहाँ मेरी भी आँखें भीग गईं ।शत शत नमन