किरण कुमार पाण्डेय के के - (10 July 2026)मानव समाज का सचित्र चित्रण करती यह रचना उसमें निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचने पर विवश करती है कि आज हम कहां खड़े हैं ! वाकई यह बड़े ही शर्म की बात है कि हम स्वयं को मनुष्य, इंसान, मानव कहलवाना चाहते हैं जबकि हमारे कर्म पाशविक, राक्षसिक एवं भोग-विलास से युक्त होते जा रहे हैं ! ऐसे में कहना ग़लत नहीं होगा कि, अब हमें खुद को इंसान, मानव, मनुष्य कहलवाना बंद कर देना चाहिए ! जिम्मेदारी से भरपूर लेख✍️✍️🙏🙏💐💐