Onkarlal Patle - (21 July 2026)मेरी एसी धारणा है कि हम अपनी आत्मा और परमात्मा से जुड़ने जाते हैं। लेकिन यहां भी हम सेल्फ़ी लेने और रिल बनाने की ओर अपने को मोड़ देते हैं। इसलिए यह प्रश्न आपने सही उठाया है कि क्या हम बराबर है? शानदार प्रस्तुति!🦚🙏🌺🌺🌺🌺🌺
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मयूरा काशीकर - (21 July 2026)आज के दौर में मन महसूस कर यादे कम समेटता है, फोन में ज्यादा यादें बसती है
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Maya Mahajan - (21 July 2026)सोचनेवाली बात कही है. टेक्निकल तरक्की का जमाना है.
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अक्षत कोठियाल 'पहाड़ी' - (21 July 2026)अपने आप को बेहतरीन तरीके से पेश करना ही शायद हमारे तकनिकी रूप का एक उद्देश्य बन गया है इस तकनिकी रूप को हम अपनी मानसिक क्षमता के अनुसार बनाते हैं जिसमे हमसे ज्यादा इस तकनिकी मंच का योगदान होता है। बहुत ही सुंदर वर्णन 🙏
"मैं राष्ट्रभक्त हूं और आजीवन राष्ट्र की सेवा करता रहूंगा !" ---किरण कुमार पाण्डेय
Book Summary
जबसे मोबाइल ने सभी उपकरणों को अपने भीतर समेटना शुरू किया है तबसे लोगों के भीतर भारी बदलाव देखने को मिला है ! लोग मंदिर क्यूं जाते हैं, इस सामान्य प्रश्न का उत्तर देने में भी असमर्थ दिखाई देते हैं परन्तु मैं मंदिर गया था, यह बताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाकर भगवान और भक्तों के साथ सेल्फ़ी लेना नहीं भूलते ! इसे देखते हुए एक प्रश्न तो बनता ही है कि, "क्या आप बराबर है ?"