यह कविता उन लेखकों पर तीखा प्रहार करती है जो अन्याय, अत्याचार और सत्य के प्रश्नों पर मौन बने रहते हैं। कवि का मानना है कि लेखक की सबसे बड़ी शक्ति उसकी कलम और उसका साहस है। यदि कोई लेखक सच के पक्ष में आवाज़ उठाने का साहस नहीं रखता, तो उसे अपनी रचनाओं में वीरता, न्याय और संघर्ष की बातें लिखने का भी नैतिक अधिकार नहीं है। कविता में "कलम", "स्याही" और "मौन" को प्रतीक बनाकर यह संदेश दिया गया है कि लेखक का धर्म केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी है। अंत में कवि कठोर शब्दों में कहता है कि जो लेखक सत्य के सामने चुप रहता है, वह वास्तव में लेखक नहीं, बल्कि जीवित होकर भी एक मुर्दे के समान है।