0लोग कहते व्यर्थ चिंतन।
उनमें मेरी गिनती नहीं।
लोग कहते सार्थक चिंतन।
उसमें मेरी स्पष्ट राय।
सुख के लिए हो चिंतन।
पा सकता है उसे जीवन।
दुख के लिए हो चिंतन।
मिट सकता है जीवन से दुख।
जो पाना है उसकी चिंतन।
चिंतन की यह बात प्रमुख।
सुख दुख उतने नहीं महान।
नहीं चलते यह युग युग।
काया माया धन नश्वर।
श्रेष्ठ है तो बस ईश्वर।
उससे बढकर कोई नहीं।
उसी को खोज जीवन भर।
गिरधारी लाल चौहान
सक्ती छत्तीसगढ़