0बुंदेली दोहे-दैत (राक्षस)
मानव हौकें आदमी,बनत फिरत है दैत।
मुरगा खाकें तापसी,खुद खौं पंडा कैत।।
कछू अलग से हैं नईं,है सुभाव ही दैत।
दूजन खौं जौ हानि दें,उल्टी पूजा लैत।।
बियावान जंगल जिते,लोग कात है दैत।
लटके चमगादड़ दिखें,डर लगबों भी कैत।।
दैत खुदइँ है आदमी,करत नराधम काम।
दूजन खौ तकलीफ दे,और करत बदनाम।।
*** दिनांक -20.4.2026
*✍️ राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'*
संपादक 'आकांक्षा' पत्रिका
संपादक-'अनुश्रुति'त्रैमासिक बुंदेली ई पत्रिका
जिलाध्यक्ष म.प्र. लेखक संघ टीकमगढ़
अध्यक्ष वनमाली सृजन केन्द्र टीकमगढ़
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