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हाल के दिनों में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप द्वारा शिक्षकों को लेकर की गई टिप्पणी ने एक नई बहस को जन्म दिया है। यह बहस किसी एक व्यक्ति, एक टिप्पणी या किसी एक मंच तक सीमित नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हम उस वर्ग के महत्व को भूलते जा रहे हैं, जिसके कंधों पर देश के भविष्य की नींव टिकी हुई है? क्या हम उस समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ शिक्षक से अपेक्षाएँ तो अनंत हों, लेकिन सम्मान और विश्वास लगातार कम होता जाए?
भारत में शिक्षक का स्थान सदैव विशेष रहा है। यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का दायित्व है। एक सैनिक सीमा की रक्षा करता है, एक चिकित्सक जीवन बचाता है, एक न्यायाधीश न्याय देता है, लेकिन इन सभी को तैयार करने वाला शिक्षक ही होता है। यदि शिक्षक को ही संदेह, उपेक्षा या उपहास का विषय बनाया जाने लगे, तो इसका प्रभाव केवल शिक्षा जगत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज पर पड़ेगा।
यह भी सच है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है। सरकारी विद्यालयों में संसाधनों की कमी, शिक्षकों के रिक्त पद, आधारभूत सुविधाओं का अभाव और लगातार बदलती नीतियाँ शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती रही हैं। ऐसे में आलोचना होनी चाहिए, लेकिन आलोचना व्यवस्था की होनी चाहिए, न कि उस पूरे शिक्षक समुदाय की जो सीमित साधनों में भी बच्चों का भविष्य संवारने में लगा हुआ है।
विडंबना यह है कि संविधान ने शिक्षा को अधिकार बनाया, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी बड़ी संख्या में लोगों के लिए एक चुनौती बनी हुई है। यही कारण है कि अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजने के लिए आर्थिक कठिनाइयाँ तक झेलते हैं। यह स्थिति स्वयं शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि शिक्षक अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहे? बिल्कुल नहीं। देश के अनेक सरकारी विद्यालय ऐसे हैं जहाँ समर्पित शिक्षकों ने सीमित संसाधनों में भी उत्कृष्ट परिणाम दिए हैं।
भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर स्थान दिया गया। महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, सांदीपनि, याज्ञवल्क्य और चाणक्य जैसे आचार्यों ने केवल विद्यार्थियों को शिक्षा नहीं दी, बल्कि युग निर्माण किया। भगवान कृष्ण जैसे व्यक्तित्व भी गुरु के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने गए। यह परंपरा बताती है कि ज्ञान और गुरु के प्रति सम्मान भारतीय सभ्यता का मूल संस्कार रहा है।
आधुनिक भारत में भी महान शिक्षाविदों ने शिक्षक की भूमिका को सर्वोच्च महत्व दिया। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि मनुष्य को बेहतर बनाना है। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को मनुष्य के भीतर छिपी शक्तियों के विकास का माध्यम बताया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी हथियार कहा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा को स्वतंत्र चिंतन और सृजनशीलता से जोड़ा। इन सभी विचारकों की दृष्टि में शिक्षक समाज परिवर्तन का केंद्रीय पात्र था।
आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी बदलाव और डिजिटल माध्यमों का युग है, तब भी शिक्षक की भूमिका समाप्त नहीं हुई है। तकनीक जानकारी दे सकती है, लेकिन संस्कार नहीं। उपकरण ज्ञान उपलब्ध करा सकते हैं, लेकिन विवेक नहीं। पाठ्य सामग्री उपलब्ध हो सकती है, लेकिन प्रेरणा नहीं। यह कार्य आज भी शिक्षक ही करता है।
दुर्भाग्य से हमारे समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति विकसित हुई है। जब कोई विद्यार्थी सफल होता है तो उसका श्रेय उसकी प्रतिभा को दिया जाता है, लेकिन जब शिक्षा व्यवस्था में कोई कमी दिखाई देती है तो पूरा दोष शिक्षक पर डाल दिया जाता है। यह दृष्टिकोण न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक। शिक्षा एक सामूहिक प्रक्रिया है जिसमें सरकार, विद्यालय, अभिभावक, समाज और विद्यार्थी सभी की भूमिका होती है।
इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि हमें शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं देखना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, सामाजिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का विकास भी है। यदि शिक्षा केवल अंक और नौकरी तक सीमित हो जाएगी, तो समाज में नैतिक संकट और गहरा होगा।
भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। आने वाले दशकों में यही युवा देश की दिशा तय करेंगे। यदि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, योग्य शिक्षक और सकारात्मक वातावरण मिला, तो भारत ज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ छू सकता है। लेकिन यदि शिक्षा और शिक्षक दोनों को ही उपेक्षित किया गया, तो इसका दुष्परिणाम पूरे राष्ट्र को भुगतना पड़ेगा।
इसलिए आवश्यकता इस बात की नहीं है कि शिक्षक और समाज आमने-सामने खड़े हों। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर गंभीर चर्चा हो, सुधार के प्रयास हों और शिक्षकों को वह सम्मान तथा सहयोग मिले जिसके वे अधिकारी हैं। शिक्षक का सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और राष्ट्र के भविष्य का सम्मान है।
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी संसदों, अदालतों और भवनों में नहीं, बल्कि उसकी कक्षाओं में तैयार होता है। इसलिए जब भी शिक्षक पर चर्चा हो, हमें यह याद रखना चाहिए कि हम केवल एक पेशे की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और राष्ट्र के भविष्य की बात कर रहे होते हैं।