4विक्रमशिला सेतु : जश्न नहीं, जवाबदेही का प्रश्न
किसी भी समाज की पहचान केवल उसके द्वारा बनाए गए पुलों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह उन पुलों की जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाता है। पुल केवल लोहे, सीमेंट और कंक्रीट के ढांचे नहीं होते, वे विकास, विश्वास और व्यवस्था की विश्वसनीयता के प्रतीक होते हैं। जब कोई पुल मजबूत होता है तो केवल दो किनारे नहीं जुड़ते, बल्कि अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक जीवन की अनगिनत संभावनाएं भी जुड़ती हैं। लेकिन जब वही पुल उपेक्षा का शिकार होने लगता है तो उसके साथ जनता का भरोसा भी दरकने लगता है।
भागलपुर का विक्रमशिला सेतु बिहार की ऐसी ही एक जीवनरेखा है। दशकों से यह पुल उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच आवागमन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। लाखों लोग प्रतिदिन इस पर निर्भर हैं। हजारों वाहन, व्यापारिक गतिविधियां, कृषि उत्पाद, छात्र, मरीज और श्रमिक इसी मार्ग से अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। ऐसे में जब इस सेतु पर बेली ब्रिज लगाने की नौबत आती है और उसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में यह जश्न का विषय है या फिर व्यवस्था की विफलता का प्रमाण?
किसी भी जिम्मेदार प्रशासन का उद्देश्य संकट आने के बाद अस्थायी समाधान खोजना नहीं होता, बल्कि संकट को समय रहते रोकना होता है। यदि किसी महत्वपूर्ण पुल को इस स्थिति तक पहुंचने दिया गया कि उस पर अस्थायी ढांचा खड़ा करना पड़े, तो यह सफलता से अधिक चेतावनी का विषय है। यह उस सोच का परिणाम है जिसमें रखरखाव को प्राथमिकता नहीं दी जाती और समस्याओं को तब तक टाला जाता है जब तक वे गंभीर रूप न ले लें।
विक्रमशिला सेतु की स्थिति अचानक नहीं बनी। वर्षों से इसकी क्षमता, संरचनात्मक स्थिति और बढ़ते यातायात दबाव को लेकर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। स्थानीय लोग, तकनीकी विशेषज्ञ और जनप्रतिनिधि समय-समय पर इस विषय को उठाते रहे। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की सुस्ती और योजनागत उदासीनता ने इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया। परिणाम आज सबके सामने है।
यह केवल एक पुल की कहानी नहीं है। यह उस विकास मॉडल की कहानी है जिसमें निर्माण को महत्व मिलता है लेकिन रखरखाव को नहीं। हमारे यहां किसी परियोजना का उद्घाटन बड़ी खबर बनता है, लेकिन उसकी नियमित निगरानी और गुणवत्ता परीक्षण शायद ही कभी सार्वजनिक चर्चा का विषय बनते हैं। विकास की राजनीति में फीता काटने का आकर्षण अधिक है, जबकि संरचनाओं को सुरक्षित बनाए रखने की जिम्मेदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
विडंबना यह है कि जनता को भी धीरे-धीरे इसी मानसिकता का अभ्यस्त बना दिया गया है। जो कार्य शासन का सामान्य दायित्व होना चाहिए, उसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सड़क की मरम्मत हो जाए तो उत्सव, बिजली कुछ घंटे अधिक मिले तो उपलब्धि और जर्जर पुल पर अस्थायी ढांचा लग जाए तो मानो विकास का नया अध्याय लिख दिया गया हो। यह लोकतांत्रिक चेतना के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
लोकतंत्र में सरकारें जनता पर उपकार नहीं करतीं। वे जनता के कर से संचालित होती हैं और जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं। इसलिए नागरिकों का यह अधिकार है कि वे पूछें—जब वर्षों पहले खतरे के संकेत दिखाई दे रहे थे तो स्थायी समाधान क्यों नहीं खोजा गया? रखरखाव की प्रक्रिया में क्या कमियां थीं? तकनीकी निगरानी कितनी प्रभावी थी? जिम्मेदारी किसकी थी और जवाबदेही किसकी तय होगी?
विक्रमशिला सेतु पर लगने वाले जाम की कहानी केवल यातायात की कहानी नहीं है। यह बिहार की विकास यात्रा की चुनौतियों का भी दस्तावेज है। घंटों तक फंसे रहने वाले वाहन केवल समय नहीं खोते, वे आर्थिक उत्पादकता भी खोते हैं। एक व्यापारी का नुकसान, एक किसान की देरी, एक छात्र की छूटी परीक्षा और एक मरीज की बढ़ती पीड़ा किसी सरकारी आंकड़े में पूरी तरह दर्ज नहीं हो पाती।
उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार के बीच व्यापारिक गतिविधियों में इस पुल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कृषि उत्पादों की ढुलाई से लेकर औद्योगिक गतिविधियों तक इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। जब इस मार्ग पर संकट आता है तो उसका असर केवल भागलपुर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए यह विषय केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि विकास और आर्थिक नियोजन का प्रश्न भी है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि बिहार में आधारभूत संरचनाओं पर बढ़ते दबाव के बावजूद दीर्घकालिक योजना का अभाव दिखाई देता है। जनसंख्या बढ़ रही है, वाहन बढ़ रहे हैं, आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन उसी अनुपात में वैकल्पिक ढांचों का विकास नहीं हो पा रहा। परिणामस्वरूप पुराने पुल और सड़कें अपनी क्षमता से कहीं अधिक बोझ उठाने को मजबूर हैं।
किसी भी विकसित राज्य की पहचान केवल नई परियोजनाओं से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह पुरानी परियोजनाओं को कितनी कुशलता से संचालित और संरक्षित रखता है। जापान, जर्मनी और अन्य विकसित देशों में आधारभूत संरचनाओं की नियमित जांच और वैज्ञानिक रखरखाव पर विशेष ध्यान दिया जाता है। वहां संकट आने का इंतजार नहीं किया जाता। हमारे लिए भी यही सीख महत्वपूर्ण है।
आज आवश्यकता केवल विक्रमशिला सेतु की मरम्मत की नहीं है। आवश्यकता उस प्रशासनिक संस्कृति को बदलने की है जिसमें समस्याओं को टालना सामान्य बात बन गई है। आवश्यकता पारदर्शी निगरानी तंत्र, नियमित तकनीकी मूल्यांकन और स्पष्ट जवाबदेही व्यवस्था की है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक हर संकट के बाद अस्थायी समाधान और बड़े दावे ही सामने आते रहेंगे।
बिहार की नई पीढ़ी अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं है। वह परिणाम देखना चाहती है। वह यह समझती है कि विकास का अर्थ केवल नए पुल बनाना नहीं, बल्कि पुराने पुलों को सुरक्षित रखना भी है। वह यह भी जानती है कि किसी राज्य का भविष्य केवल भाषणों से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं और जवाबदेह प्रशासन से बनता है।
विक्रमशिला सेतु का वर्तमान संकट हमें एक बड़ा सबक देता है। यह बताता है कि विकास केवल निर्माण नहीं, संरक्षण भी है। यह बताता है कि योजनाएं केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर सफल होनी चाहिए। यह बताता है कि जनता की समस्याओं का समाधान संकट के बाद नहीं, संकट से पहले होना चाहिए।
आज जब बेली ब्रिज को लेकर चर्चा हो रही है, तब असली चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए। जनता को यह अधिकार है कि वह स्थायी समाधान की मांग करे। उसे यह पूछने का अधिकार है कि उसकी जीवनरेखा बनी संरचनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
क्योंकि किसी राज्य का भविष्य केवल नए सपनों पर नहीं टिका होता, बल्कि उन पुलों पर भी टिका होता है जो रोज लाखों लोगों को उनके सपनों तक पहुंचाते हैं। और जब उन पुलों पर संकट आता है, तब जश्न नहीं, जवाबदेही सबसे बड़ा प्रश्न बन जाती है।