4क्रांति, राजनीति और कॉकरोच आंदोलन
कॉकरोच आंदोलन का नाम सुनते ही बहुत से लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ सकती है। कुछ लोग इसे मज़ाक समझ सकते हैं, कुछ व्यंग्य और कुछ इसे व्यवस्था-विरोध की एक अनगढ़ अभिव्यक्ति मान सकते हैं। लेकिन यदि इस नाम के भीतर छिपे प्रतीक को समझा जाए, तो यह हमारे समय की सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक विडंबनाओं पर एक तीखी टिप्पणी बनकर उभरता है।
कॉकरोच वह जीव है जिसे मनुष्य घृणा की दृष्टि से देखता है। वह सभ्यता की चमकदार तस्वीरों में कहीं दिखाई नहीं देता। वह किसी राष्ट्रीय प्रतीक का हिस्सा नहीं बनता। उसके लिए कोई स्मारक नहीं बनते। कोई उसके सम्मान में गीत नहीं लिखता। लेकिन उसके भीतर एक विचित्र जिजीविषा होती है। उसे कुचल दो, वह फिर दिखाई देता है। उसे भगा दो, वह फिर लौट आता है। उसे मिटाने की कोशिश करो, वह किसी कोने में जीवित बचा रहता है।
जनता भी अक्सर कुछ ऐसी ही होती है।
लोकतंत्र में जनता को सर्वोच्च कहा जाता है, लेकिन व्यवहार में उसे चुनावी मौसम का पोस्टर बना दिया जाता है। उसके नाम पर भाषण होते हैं, योजनाएँ बनती हैं, घोषणाएँ होती हैं, लेकिन निर्णय अक्सर उसके सिर पर थोपे जाते हैं। जनता को सम्मानित कम और इस्तेमाल अधिक किया जाता है।
यहीं से कॉकरोच आंदोलन का प्रतीक जन्म लेता है।
यह उस आम आदमी की कथा है जो बार-बार ठगा जाता है, लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ता। जिसे हर चुनाव में नया सपना दिया जाता है और हर चुनाव के बाद नया बहाना। जिसे विकास के नाम पर प्रतीक्षा मिलती है, न्याय के नाम पर आश्वासन और भागीदारी के नाम पर ताली बजाने का अधिकार।
लेकिन हर आंदोलन के सामने एक प्रश्न खड़ा होता है।
क्या उसका उद्देश्य सत्ता को चुनौती देना है या स्वयं सत्ता बन जाना?
यहीं से क्रांति और राजनीति के रास्ते अलग हो जाते हैं।
क्रांति का पहला कदम प्रश्न है।
राजनीति का पहला कदम गणित।
क्रांति पूछती है—यह व्यवस्था ऐसी क्यों है?
राजनीति पूछती है—इस व्यवस्था में मेरी हिस्सेदारी कितनी है?
क्रांति का संबंध नैतिक साहस से है। राजनीति का संबंध शक्ति-संतुलन से।
इसीलिए इतिहास में अनेक बार ऐसा हुआ कि क्रांति ने जनता को जगाया और राजनीति ने उस जागी हुई जनता को अपने पक्ष में संगठित कर लिया।
समस्या राजनीति नहीं है। राजनीति लोकतंत्र का आवश्यक उपकरण है। समस्या तब पैदा होती है जब क्रांति राजनीति की सीढ़ी बन जाती है और राजनीति स्वयं को क्रांति घोषित करने लगती है।
हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि विरोध भी अब एक उद्योग बनता जा रहा है।
कभी आंदोलन भूख से पैदा होते थे। अब कई बार वे ब्रांडिंग से पैदा होते हैं।
कभी लोग जेल जाने के लिए आंदोलन करते थे। अब कई बार लोग टीवी डिबेट में आने के लिए आंदोलन करते हैं।
कभी संघर्ष जीवन का हिस्सा होता था। अब वह सोशल मीडिया की रणनीति बनता जा रहा है।
यह आलोचना किसी एक व्यक्ति या संगठन की नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की है जिसने विरोध को भी बाज़ार का उत्पाद बना दिया है।
आज हर विचारधारा के पास अपने-अपने क्रांतिकारी हैं और हर क्रांतिकारी के पास अपनी-अपनी दर्शक-दीर्घा।
सवाल यह है कि जनता कहाँ है?
जिस किसान के नाम पर भाषण दिए जाते हैं, क्या वह मंच पर है?
जिस मजदूर के नाम पर घोषणाएँ होती हैं, क्या वह निर्णय प्रक्रिया में है?
जिस युवा के भविष्य की चिंता जताई जाती है, क्या वह वास्तव में सुना जा रहा है?
अक्सर उत्तर नकारात्मक होता है।
जनता पोस्टर में होती है, नेतृत्व बैनर में।
जनता भीड़ में होती है, निर्णय मंच पर।
जनता नारे लगाती है, समझौते बंद कमरों में होते हैं।
क्रांति की असली परीक्षा सत्ता-विरोध में नहीं, सत्ता-प्रलोभन में होती है।
सत्ता का विरोध करना अपेक्षाकृत आसान है।
सत्ता का प्रस्ताव ठुकराना कठिन।
क्योंकि कुर्सी में एक विचित्र आकर्षण होता है। वह विचारों को व्यवहारिकता में और व्यवहारिकता को समझौते में बदल देती है।
इतिहास के पन्ने ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं।
कितने ही आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के नारे से शुरू हुए और अंततः व्यवस्था का हिस्सा बन गए।
कितने ही नेताओं ने जनता की आवाज़ बनकर यात्रा शुरू की और सत्ता की भाषा बोलते हुए समाप्त हुए।
यह कोई व्यक्तिगत विफलता नहीं है। यह सत्ता की प्रकृति है।
सत्ता हमेशा आलोचक को सहभागी बनाना चाहती है।
वह विरोध को समाप्त नहीं करती, उसे समाहित कर लेती है।
और जब विरोध समाहित हो जाता है, तब जनता को भ्रम होने लगता है कि परिवर्तन आ गया है।
जबकि अक्सर केवल चेहरे बदलते हैं।
चरित्र नहीं।
इसीलिए कॉकरोच आंदोलन यदि केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि एक वैचारिक आग्रह है, तो उसे सबसे पहले सत्ता की भाषा से सावधान रहना होगा।
उसे याद रखना होगा कि आंदोलन का उद्देश्य संसद तक पहुँचना नहीं, संसद को जनता तक पहुँचाना है।
उसे यह भी समझना होगा कि हर संघर्ष का अंत चुनाव नहीं होता।
कई संघर्षों का उद्देश्य केवल समाज को आईना दिखाना होता है।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ नैतिकता भी पक्षों में बँट चुकी है।
एक पक्ष का भ्रष्टाचार रणनीति कहलाता है और दूसरे पक्ष का भ्रष्टाचार अपराध।
एक पक्ष की चुप्पी विवेक कहलाती है और दूसरे पक्ष की चुप्पी कायरता।
एक पक्ष का आंदोलन लोकतंत्र कहलाता है और दूसरे पक्ष का आंदोलन अराजकता।
इस दोहरेपन ने समाज को भीतर तक खोखला कर दिया है।
जनता अब विचारों पर नहीं, पहचान पर विभाजित की जा रही है।
तर्क की जगह निष्ठा ने ले ली है।
संवाद की जगह शोर ने।
और प्रश्न की जगह नारे ने।
ऐसे समय में कॉकरोच आंदोलन का वास्तविक महत्व सत्ता प्राप्ति में नहीं, प्रश्न पूछने की संस्कृति को जीवित रखने में है।
क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति मतदान नहीं, प्रश्न है।
जिस दिन जनता प्रश्न पूछना छोड़ देती है, उसी दिन लोकतंत्र चुनावी उत्सव में बदल जाता है।
फिर नेता बदलते हैं, व्यवस्थाएँ नहीं।
घोषणाएँ बदलती हैं, प्राथमिकताएँ नहीं।
भाषण बदलते हैं, चरित्र नहीं।
आज आवश्यकता नए मसीहाओं की नहीं है।
आवश्यकता नए प्रश्नों की है।
आवश्यकता ऐसे आंदोलनों की है जो जनता को अनुयायी नहीं, सहभागी बनाएँ।
जो व्यक्ति-पूजा के स्थान पर विचार-पूजा को बढ़ावा दें।
जो सत्ता को गिराने से पहले समाज को जगाने का प्रयास करें।
क्योंकि सोई हुई जनता के ऊपर खड़ी कोई भी नई सत्ता अंततः पुरानी सत्ता जैसी ही हो जाती है।
यही इतिहास का सबसे बड़ा सबक है।
क्रांति तब तक जीवित रहती है जब तक वह जनता की चेतना में रहती है।
जैसे ही वह केवल संगठन, पद और संरचना में सिमट जाती है, उसका हृदय धीरे-धीरे मरने लगता है।
और जब क्रांति का हृदय मर जाता है, तब केवल राजनीति बचती है।
फिर नारे वही रहते हैं, अर्थ बदल जाते हैं।
झंडे वही रहते हैं, उद्देश्य बदल जाते हैं।
चेहरे वही रहते हैं, चरित्र बदल जाते हैं।
तब जनता फिर किसी नए आंदोलन की तलाश में निकल पड़ती है।
किसी नए कॉकरोच की तलाश में।
किसी ऐसे जीवट की तलाश में जिसे बार-बार कुचला जाए, लेकिन जो फिर उठ खड़ा हो।
क्योंकि इतिहास का सबसे बड़ा सत्य यह है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता की बेचैनी स्थायी होती है।
और जब तक वह बेचैनी जीवित है, तब तक हर व्यवस्था के सामने कहीं न कहीं एक कॉकरोच ज़रूर मौजूद रहेगा—छोटा, उपेक्षित, उपहास का पात्र, लेकिन जिद्दी।
इतना जिद्दी कि वह बार-बार सत्ता को याद दिलाता रहेगा कि सिंहासन जनता से बड़ा नहीं होता।