0बुंदेली दोहा प्रतियोगिता-282(22.8.2026)
प्रदत्त शब्द-करयाई (कमर)
संयोजक राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
आयोजक जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़
प्राप्त प्रविष्ठियां
1
टूटत है जो पेट सें,करयाई झुक जात।
भर ज्वानी में बेइ अब,बूड़े घाॅंइॅं दिखात।।
-आशाराम वर्मा 'नादान',पृथ्वीपुर
2
करयाई पे चढ़ चले,राम लखन बलवान।
मिलन गये सुग्रीव से,लिए साथ हनुमान।।
-प्रमोद मिश्रा,बल्देवगढ़
3
करयाई जसुदा चढ़े,श्याम आज मुस्कायँ।
तीन भुवन के देवता,लीला खूब रचायँ।।
-सुभाष सिंघई,जतारा
4
करयाई बिच करधनी,कंठ मोतिया माल।
पग पैजनिया की छनक,ठुमक चले नँदलाल। श।
-आशा रिछारिया,निवाड़ी
*5*
करयाई में खोंस कें,गुच्छा घुँघरू दार।
निकरी हैं गोरी धना,मौं पे घुँघटा डार।।
-अनुराधा गर्ग दीप्ति, जबलपुर
6
कालनेमि करयाइ में,हनी हूक कैं लात।
हनूमान हातन भई,कालनेमि की मात।।
-प्रदीप खरे 'मंजुल' टीकमगढ़
7
करयाई शहरन मुड़ी,मैनत उतै बिलात।
गाँव वसाहट छोड़ती, बेकारन की पाँत।।
-लल्ला सुरेन्द्र सिंह चौरसिया 'लल्लन मुनि',महाराजपुर
*8*
नैंन जोत धीमी परी, उर तागत मरयाइ।
निगत कपत लठिया लयें,टेडी भइ करयाइ।।
-भगवान सिंह लोधी'अनुरागी',हटा
9
देह खड़ेरा हो गई,गुड़या गइ है चाम।
करयाई टेंड़ी भई,अब तो भज ले राम।।
-तरुणा खरे'तनु',जबलपुर
10
भडयाई करबै गये, उलटो पर गव दाव।
करयाई सबरी छुली,भडया कड गव नाव।।
-विशाल कड़ा 'मांझी',बडोराघाट
11
बज्जुर सी छाती बनी, लचक गई करयाइ।
धरती पूत किसान की,किस्मत है दुखदाइ।।
-अजित जैन'जलज',टीकमगढ़
12
भग कें गई ती मायकें, भइया सें लरयाइ।
मैंनें हँसकें पूँछ लइ, टोडारी करयाइ।।
-अंजनी कुमार चतुर्वेदी निबाड़ी
13
आइँ कुआ की पाट पै,खेप भरन भौजाइ।
खेंचत भरी कसेंड़िया,लचक रई करयाइ।।
-प्रभुदयाल श्रीवास्तव 'पीयूष,टीकमगढ़
14
जीवन में रखियौ सदां,करयाई कौ ध्यान।
सूदे सूदे रौ चलत,मन में लो जा ठान।।
-वीरेन्द्र चंसौरिया टीकमगढ़
15
का खाबें का छोड़ दें, समझ न आबै भाइ।
मैंगाई की मार सें,टूट गई करयाइ।।
-डॉ.देवदत्त द्विवेदी बड़ामलहरा
16
मँहगाई की मार नै, दइ करयाई टोर।
सत्तर की शक्कर बिकैं,मचौ देश में शोर।।
-एस.आर सरल', टीकमगढ़
17
इक दूजे के सोह रय, करयाई पै हाथ।
सावन झूला झूल रय,राधा-मोहन साथ।।
-गोकुल प्रसाद यादव, नन्हींटेहरी
18
करयाई टूटी धरी, महँगाई की मार।
कैसें होवै अब गुजर,करे गरीब बिचार।।
-श्यामराव धर्मपुरीकर,गंजबासौदा
19
करयाई लचकी हती. कुब्जा बिकल कुरूप।
भई कृपा श्री कृष्ण की.पायौ रूप अनूप।।
- रामानंद पाठक'नंद' नैगवां