3आस्था : दिव्य ऊर्जा से ईश्वर-भक्ति तक की अंतर्यात्रा
आस्था केवल विश्वास का नाम नहीं है, आस्था तो मनुष्य के अंतर्मन में ईश्वर द्वारा स्थापित वह दिव्य ऊर्जा है, जो जीवन को प्रकाश, दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है। आस्था का निर्माण अचानक नहीं होता। वह हमारे सत्कर्मों की भूमि में अंकुरित होने वाला पवित्र बीज है। जैसे बीज को अंकुरित होने के लिए उपयुक्त मिट्टी, जल और प्रकाश की आवश्यकता होती है, वैसे ही आस्था के अंकुरण के लिए शुद्ध विचार, सदाचार, सेवा, करुणा और निष्काम कर्म आवश्यक होते हैं।
जब जीवात्मा के भीतर सकारात्मक तत्वों की ऊर्जा निरंतर बढ़ने लगती है, तब उसके अंतःकरण में ईश्वर-भक्ति का मार्ग स्वतः प्रकाशित होने लगता है। मनुष्य का मन जितना निर्मल होता जाता है, उतना ही उसमें परमात्मा के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की अनुभूति गहरी होती जाती है। भक्ति बाहर से थोपी हुई भावना नहीं, बल्कि भीतर जागृत हुई दिव्य चेतना का स्वाभाविक प्रवाह है।
इस सृष्टि में ऊर्जा का एक विराट और निरंतर गतिशील संसार विद्यमान है। ऊर्जा किसी एक स्थान पर सीमित नहीं रहती। वह अपने स्वरूप के अनुसार मनुष्य, घर, परिवार, खेत, धन-संपत्ति, मार्ग, नदी, वृक्ष, ग्राम और समुद्र—कहीं भी अपना प्रभाव स्थापित कर सकती है। सकारात्मक ऊर्जा जहाँ अपना स्थान बनाती है, वहाँ जीवन में उत्साह, शांति, प्रेम और सृजनशीलता का संचार होता है।
मनुष्य अपने विचारों और कर्मों से पहचाना जाता है। उसके कर्म उसके अंतर्मन का दर्पण होते हैं। किंतु विचारों के पीछे छिपी ऊर्जा को पहचानना सरल नहीं होता। मनुष्य का बाहरी व्यवहार दिखाई देता है, परंतु उसके भीतर चलने वाला विचार-संघर्ष अदृश्य रहता है। इसलिए किसी व्यक्ति को केवल उसके बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उसके विचारों, कर्मों और जीवन-मूल्यों से समझना चाहिए।
जब नकारात्मकता मनुष्य के जीवन की सारथी बन जाती है, तब आस्था का प्रकाश धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगता है। क्रोध, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या और अविश्वास मनुष्य को स्वयं से तथा ईश्वर से दूर करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य अपने भीतर की अशांति का दोष आस्था, ईश्वर अथवा ईश्वरभक्तों पर डालने लगता है। वास्तव में समस्या बाहर नहीं, भीतर उत्पन्न हुई नकारात्मक ऊर्जा में होती है।
जहाँ सकारात्मकता प्रबल होती है, वहाँ नकारात्मकता के लिए स्थायी स्थान नहीं बचता। जैसे प्रकाश के उपस्थित होते ही अंधकार स्वतः हट जाता है, वैसे ही सद्विचारों की ज्योति नकारात्मकता को दूर कर देती है। इसलिए हमें अपनी ईश्वरीय भक्ति की ऊर्जा को निरंतर सुरक्षित रखना चाहिए। सत्संग, सेवा, स्वाध्याय, सदाचार और निष्काम कर्म इस ऊर्जा को पुष्ट करते हैं।
आस्था का अर्थ केवल ईश्वर से कुछ माँगना नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा दिए गए जीवन को सत्य, प्रेम, सेवा और सद्कर्मों से सार्थक बनाना है। आस्था उस दिव्य ऊर्जा का लाभार्थी बनना है, जो मनुष्य को भीतर से मजबूत करती है और जीवन को प्रकाशमय बनाती है।
जय हो मंगलमूर्ति!
जय हो विघ्नहर्ता!
जय हो बुद्धिदाता!
🕉️🌹🚩🌹💐🌹