3गति : परमात्मा की शाश्वत लीला
सृष्टि का प्रथम स्पंदन ही गति है। जहाँ गति है, वहीं जीवन है; जहाँ गति समाप्त होती है, वहाँ दृश्य जगत का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है। परमात्मा स्वयं निराकार होकर भी अपनी शक्ति को गति के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड में अभिव्यक्त करता है। आकाश में ग्रहों की परिक्रमा से लेकर हृदय की धड़कन तक, श्वास के आवागमन से लेकर विचारों के उदय और विलय तक, प्रत्येक स्पंदन में उसी अनंत सत्ता की गति विद्यमान है।
प्रकृति कभी स्थिर नहीं रहती। प्रभात संध्या में बदलता है, बाल्यावस्था यौवन में प्रवेश करती है, यौवन वृद्धावस्था की ओर बढ़ता है और अंततः शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो जाता है। पूर्णिमा क्षीण होकर अमावस्या बनती है और अमावस्या की निस्तब्धता से पुनः चंद्रकलाएँ जन्म लेती हैं। ऋतुएँ आती-जाती हैं, नदियाँ बहती हैं, वायु चलती है और समय अपनी अदृश्य धारा में सबको अपने साथ लेकर आगे बढ़ता रहता है। यही गति सृष्टि का मौन उपदेश है कि परिवर्तन ही दृश्य संसार का शाश्वत नियम है।
मनुष्य गति को रोकना चाहता है, किंतु गति को रोकना उसके सामर्थ्य में नहीं है। वह धन को रोकना चाहता है, यौवन को रोकना चाहता है, सत्ता को रोकना चाहता है, सुख को रोकना चाहता है और अपने प्रिय क्षणों को पकड़कर रखना चाहता है; परंतु काल की गति किसी के हाथों में बंधती नहीं। जो क्षण चला गया, वह स्मृति बन गया। जो क्षण सामने है, वही कर्म का अवसर है और जो आने वाला है, वह अभी परमात्मा की गोद में छिपा हुआ है।
इसलिए जीवन का वास्तविक धन समय है। धन खोकर पुनः प्राप्त किया जा सकता है, वस्तुएँ नष्ट होकर फिर बनाई जा सकती हैं, शरीर रोगग्रस्त होकर उपचार पा सकता है; परंतु बीता हुआ क्षण लौटकर नहीं आता। प्रत्येक क्षण आत्मा के द्वार पर दस्तक देता है और पूछता है—“मेरा उपयोग किसके लिए किया?” यदि वह क्षण सेवा में लगा, तो वह पुण्य बन गया; यदि भक्ति में लगा, तो साधना बन गया; यदि ज्ञान में लगा, तो आत्मप्रकाश बन गया और यदि परोपकार में लगा, तो मानवता की अमर स्मृति बन गया।
गति केवल बाहर नहीं है, भीतर भी है। शरीर बदल रहा है, मन बदल रहा है, विचार बदल रहे हैं, इच्छाएँ बदल रही हैं और जीवन की परिस्थितियाँ निरंतर अपना रूप बदल रही हैं। किंतु इन सब परिवर्तनों को जो भीतर से देख रहा है, वह साक्षी कौन है? वही आत्मतत्त्व है। गति के बीच उस अचल साक्षी को पहचान लेना ही अध्यात्म की गहनतम अनुभूति है। संसार गतिमान है, किंतु आत्मा उस गति की साक्षी है।
कर्म भी गति है। विचार से संकल्प, संकल्प से कर्म और कर्म से संस्कार की यात्रा निरंतर चलती रहती है। इसलिए प्रत्येक विचार को पवित्र करना आवश्यक है, क्योंकि विचार ही भविष्य के कर्मों का बीज है। मनुष्य अपने कर्मों से केवल संसार को नहीं, स्वयं को भी गढ़ता है। गति हमें निरंतर अवसर देती है कि हम अपने भीतर के अंधकार को प्रकाश में, अहंकार को विनम्रता में और स्वार्थ को सेवा में परिवर्तित करें।
आओ प्यारे लाल, गति से संघर्ष नहीं, गति के साथ साधना करें। समय को अपना स्वामी नहीं, परमात्मा का संदेशवाहक समझें। प्रत्येक श्वास में नाम हो, प्रत्येक कर्म में धर्म हो, प्रत्येक विचार में करुणा हो और प्रत्येक क्षण में आत्मकल्याण की जागृति हो। जीवन की गति चाहे कितनी भी तीव्र क्यों न हो, यदि दिशा परमात्मा की ओर है, तो प्रत्येक कदम साधना बन जाता है।
हे काल के काल महाकाल, हमें ऐसी दृष्टि दो कि परिवर्तन में भी तुम्हारी उपस्थिति दिखाई दे, गति में भी तुम्हारी लीला दिखाई दे और क्षणभंगुर संसार के मध्य उस शाश्वत सत्य का अनुभव हो। हमारी जीवनगति भौतिक संचय की ओर नहीं, आत्मबोध की ओर बढ़े। हमारी श्वास समाप्त होने से पहले हमारी चेतना तुम्हारे चरणों में समर्पित हो जाए।
गति तुम्हारी, काल तुम्हारा, कर्म तुम्हारा विधान।
हम तो केवल यात्री हैं—तुम ही मार्ग, तुम ही मंजिल और तुम ही अंतिम सत्य।
जय हो गति-विधाता।
जय हो कालस्वरूप महाकाल।
जय हो परमात्मा की शाश्वत लीला।
ॐ नमः शिवाय। 🚩🌹
लेखक
विद्यावाचस्पति प्रो.डा. रामकृष्णादादा महाराज पाटील