5अपनी तरह उसे समझा।
पाया कभी भी नहीं।
पाना चाहता है यह मन।
मन को समझ आया ही नहीं।
समझा होता न उलझता।
उसने सुलझाया ही नहीं।
अंधेरा भी उसे छुपा न सका।
नहीं कह सकता बचाया नहीं।
कौन नहीं यहाँ बचना चाहेगा।
वैसी राह आया ही नहीं।
उजाला तो उजाला है।
और कोई बनाया नहीं।
एक बनाने वाले जग का।
दूसरा नाम आया नहीं।
लोग कहते मैंने भी बनाया।
कहने को तो टिकाया ही नहीं।
लोग व्यर्थ करते हैं बातें।
जिसको जगाया ही नहीं।
मैं मौन रहना उचित माना.।
अब समझा पग बढाया नहीं।
गिरधारी लाल चौहान
सक्ती छत्तीसगढ़