1कैसे कहोगे समझ गया हूँ।
इस बात में नहीं नया हूँ।
ए तो है बचपन का खेल।
अब हो रहा उससे मेल।
इस खेल में कई बार थका हूँ।
अब वह खेल खेल नहीं।
वास्तविकता से मेल नहीं।
दिमाग में सब रखा हूँ।
उस समय भयभीत थे।
साधारण से गीत थे।
याद हैभूलने से बचा हूँ।
कल का खेल ही जीवन है।
जी रहे जिसे पावन है।
देखो उसी से बंध गया हूँ।
गिरधारी लाल चौहान
सक्ती छत्तीसगढ़