"गाली" एक विचारोत्तेजक सामाजिक लेख है, जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बढ़ती अभद्र भाषा और उसके दुष्प्रभावों पर प्रकाश डालता है। यह लेख बताता है कि घर, परिवार, कार्यालय, सार्वजनिक स्थानों, शादी-पार्टियों और सोशल मीडिया पर गाली देना किस प्रकार एक सामान्य आदत बनता जा रहा है। साथ ही यह भी समझाता है कि ऐसी भाषा का बच्चों के मन, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक संबंधों और व्यक्तित्व पर कितना गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
यह लेख पाठकों को आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है l
लेखक -- मुकेश कुमार